पश्चिम एशिया में 1 मार्च 2026 को शुरू हुए संघर्ष के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे भारतीय जहाजों को लेकर भारत एक सख्त और अलिखित नीतिगत फैसला पर कायम है, वह यह है कि कोई भी भारतीय कंपनी या जहाज मालिक ईरान को किसी भी रूप में वित्तीय भुगतान करके बाहर नहीं निकलेगा। अभी भी 14 भारतीय जहाज इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं।
संघर्ष शुरू होने पर कई जहाजों को ईरानी नौसेना ने रोक लिया था या हमले का सामना करना पड़ा था। इसके बाद राजनयिक बातचीत और अंतरराष्ट्रीय दबाव के जरिए 11 जहाजों को सुरक्षित बाहर निकाला गया, लेकिन बिना किसी आर्थिक समझौते के।
जानकारों का कहना है कि गैर-खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति में भारी बढ़ोतरी के कारण यह फैसला भारत के लिए अपेक्षाकृत आसान हो गया है।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि यह भारत की स्पष्ट नीति है कि जहाजों को होर्मुज से बाहर निकालने के लिए किसी भी पक्ष को किसी तरह का वित्तीय भुगतान नहीं किया जाएगा।
उक्त अधिकारी के मुताबिक, “हमारी ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता पर जोखिम है लेकिन किसी भी देश को ‘टोल टैक्स’ या रिहाई शुल्क के रूप में पैसे देने से गलत परंपरा की शुरुआत हो जाएगी।” जबकि कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कुछ अन्य देशों के जहाजों को ईरान सरकार ने ‘टोल टैक्स’ या स्थानीय बैंक के जरिए भुगतान लेकर ही गुजरने की अनुमति दी।
भारत का मानना है कि ऐसा भुगतान न सिर्फ सुरक्षा जोखिम बढ़ाएगा बल्कि भविष्य में समुद्री मार्गों पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देगा।अधिकारियों का कहना है कि होर्मुज जल मार्ग के मुहाने पर नाकेबंदी कर रहे अमेरिकी पक्ष को भारतीय जहाजों के आवागमन के लिए राजी करना मुश्किल नहीं है। असली समस्या होर्मुज जल मार्ग के अंदर विभिन्न बंदरगाहों पर अटके जहाजों को बाहर लाने की है।
मोटे तौर पर अभी उस क्षेत्र में दुनिया भर के तकरीबन 1600 जहाजों के फंसे होने की बात सामने आ रही है। सामान्य दिनों में रोजाना 150-200 कार्गो या अन्य ढुलाई करने वाले जहाज वहां से दुनिया भर में जाते हैं। अभी यह संख्या घट कर 5-10 रह गई है। ऐसे में अगर ईरान व अमेरिका के बीच होर्मुज को खोलने की सहमति बन भी जाती है तो वहां से जहाजों को सुरक्षित बाहर निकाल कर स्थिति को सामान्य करने में कई हफ्तों का समय लग सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। देश की कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 30 प्रतिशत और एलपीजी का 90 प्रतिशत इसी मार्ग से आता है। संघर्ष शुरू होने के तुरंत बाद भारत ने रूस, अमेरिका, मैक्सिको और नाइजीरिया जैसे गैर-खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना शुरू कर दिया। इससे गैर-खाड़ी क्षेत्रों से तेल आपूर्ति की हिस्सेदारी पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई और खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता घटकर लगभग 30 प्रतिशत रह गई है। इससे न सिर्फ आपूर्ति सुनिश्चित हुई बल्कि होर्मुज में फंसे जहाजों को लेकर सख्त रुख अपनाने में भी भारत को रणनीतिक मजबूती मिली।
विदेश मंत्रालय लगातार ईरानी अधिकारियों से संपर्क में है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय जहाजों की सुरक्षित निकासी की मांग कर रहा है। बाकी 14 जहाजों के चालक दल की सुरक्षा और उनकी समय पर वापसी सरकार की प्राथमिकता बनी हुई है।