ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी युद्ध का असर सिर्फ गैस और एनर्जी पर ही नहीं पड़ रहा है। इसका असर कई देशों की करेंसी पर भी देखा जा रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।
भारत का रुपया 94 के अहम स्तर को भी पार कर गया। इंट्रा-डे ट्रेड में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले यह 94.40 के रिकॉर्ड निचले स्तर (India Rupees All Time Low) पर पहुंच गया।
पिछले महीने युद्ध शुरू होने के बाद से इसमें लगभग 3.5% की गिरावट आई है, और 31 मार्च, 2025 के बाद से यह 10% से भी ज्यादा नीचे गिर चुका है।
पश्चिम एशिया में संघर्ष (Middle East Conflict) शुरू होने के बाद से ही भारतीय रुपये में तेज गिरावट देखने को मिल रही है। तेल की कीमतों में अचानक आई तेजी ने रुपये पर दबाव डाला है। तेल की बढ़ती कीमतों से दुनिया भर में महंगाई बढ़ने की चिंताएं पैदा हो गई हैं।
क्यों गिर रहा है भारत का रुपया?
करेंसी एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारतीय रुपये के लिए सबसे बड़ा कारक पश्चिम एशिया का संघर्ष (Iran War) बना हुआ है। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संघर्ष किस तरह समाप्त होगा, इसे लेकर बनी अनिश्चितता।
CR Forex Advisors के एक विश्लेषक ने कहा, “इस खींचतान की वजह से बाजार सतर्क बने हुए हैं। नतीजतन, जल्द समाधान की उम्मीद कमजोर पड़ गई है, और इसी अनिश्चितता का असर एक बार फिर रुपये जैसी उभरते बाजारों की मुद्राओं पर पड़ रहा है।”
लगातार दबाव और सोने-चांदी की कीमतों ने भी करेंसी मार्केट के सेंटीमेंट पर असर डाला। कीमतें गिर गईं क्योंकि सेंटीमेंट फिर से ‘रिस्क-ऑफ’ हो गया है, हालांकि यह अभी भी उस हद तक नहीं है जैसा हमने तीन दिन पहले देखा था।
सोना $4,500/oz के अहम स्तर से नीचे गिर गया है, जबकि चांदी $70 प्रति ट्रॉय औंस के स्तर से काफी नीचे ट्रेड कर रही है।
इससे पहले भारत के रुपये (Indian Rupee Down) में ऐसी ही गिरावट 2013-14 में देखने को मिली थी, जब फेडरल रिजर्व ने संकेत दिया था कि वह संकट के बाद दिए गए मौद्रिक प्रोत्साहन को वापस लेना शुरू करेगा।
इस घटना, जिसे ‘टेपर टैंट्रम’ कहा गया, ने वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल मचा दी थी। वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से यह रुपया के लिए सबसे ज्यादा उथल-पुथल भरा दौर था।