एक अदालत ने यहां एक निलंबित आयकर अधिकारी और उनकी पत्नी को 2007 के बेहिसाब संपत्ति मामले में बरी कर दिया है और सीबीआइ की ”गलत” और ”लापरवाह” जांच पर सवाल उठाया है।
विशेष सीबीआई अदालत के न्यायाधीश डीएस देशमुख ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में आरोपित को निर्दोष साबित करने की आवश्यकता नहीं है और संभाव्यता का प्रबल होना ही पर्याप्त है।
अदालत ने अनिल रत्नाकर मल्लेल (45), जो तब महाराष्ट्र के ठाणे जिले में तैनात आयकर अधिकारी थे और उनकी पत्नी सुवर्णा अनिल मल्लेल (43) को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धारा 109 (उकसाने) के तहत आरोपों से मुक्त कर दिया।
सीबीआई के एंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी), मुंबई ने जनवरी 2007 में यह मामला दर्ज किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि सितंबर 1991 से दिसंबर 2006 के बीच अनिल मल्लेल ने अपनी आधिकारिक स्थिति का दुरुपयोग करके अपने और अपने परिवार के नाम पर संपत्ति जमा की।
प्रारंभिक एफआईआर में बेहिसाब संपत्तियों का मूल्य 15.34 लाख रुपये बताया गया था, जबकि सीबीआई ने नवंबर, 2008 में दायर अपनी अंतिम चार्जशीट में इस आंकड़े को बढ़ाकर 28,57,984 रुपये कर दिया।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील एमएस मोरे ने तर्क किया कि सीबीआई ने नकद प्रवाह के वैध स्त्रोतों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया, जिसमें मल्लेल की पत्नी और उनकी दिवंगत मां द्वारा लिया गया 8 लाख रुपये का संयुक्त आवास ऋण, 2000 से पत्नी द्वारा दाखिल किए गए स्वतंत्र आयकर रिटर्न, सामान्य भविष्य निधि से निकासी और रिश्तेदारों से लिए गए दस्तावेजित ऋण शामिल हैं।