किन्नरों को केवल OBC सूची में शामिल करना दिखावटी कदम: राजस्थान हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की…

राजस्थान उच्च न्यायालय ने किन्नर समुदाय को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए 3 प्रतिशत अतिरिक्त अंक देने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने किन्नरों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) सूची में शामिल करने के सरकार के फैसले को केवल दिखावा बताया है और कहा कि इससे उन्हें वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा है। राज्य सरकार को कर्नाटक एवं तमिलनाडु की तरह एक प्रभावी आरक्षण नीति तैयार करनी चाहिए।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने नई प्रभावी नीति बनाने के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित करने के निर्देश दिए हैं।

कमेटी में किन्नर समुदाय एवं समाज के प्रतिष्ठित प्रतिनिधि शामिल करना होगा। न्यायालय ने किन्नरों को केवल ओबीसी में रखने वाली साल, 2023 की अधिसूचना को असंवैधानिक माना है।

न्यायाधीश अरुण मोंगा एवं न्यायाधीश योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने जालौर निवासी किन्नर गंगाकुमारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

याचिकाकर्ता की ओर से वकीलों ने तर्क दिया कि राज्य किन्नरों को अलग क्षैतिज आरक्षण नहीं देता है, जिससे अनूसूचित जाति एवं जनजाति परिवारों में जन्मे किन्नरों को अपनी जन्म आधारित श्रेणी अथवा किन्नर में किसी एक को चुनना पड़ता है, जो उनके लिए नुकसानदेह है।

सरकारी रिकार्ड के अनुसार, राज्य में किन्नर समुदाय की आबादी 16,517 है। वहीं राज्य की कुल आबादी छह करोड़ से ज्यादा है। इसमें ओबीसी की आबादी तीन करोड़ 24 लाख है।

ऐसे में किन्नर समुदाय की आबादी कुल का 0.024 प्रतिशत और ओबीसी का 0.046 प्रतिशत है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने माना कि इतनी कम जनसंख्या के लिए रोस्टर प्रणाली में अलग क्षैतिज आरक्षण व्यावहारिक नहीं होगा, क्योंकि उनका नंबर बहुत लंबे अंतराल के बाद आएगा।

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