सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन दया नहीं, बल्कि उनका कानूनी अधिकार है…

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि दिव्यांगता पेंशन कोई इनाम या अनुग्रह राशि नहीं है जो सरकार की दया पर निर्भर हो। अदालत ने कहा कि इस मामले में सरकार चयनात्मक या भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपना सकती।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने आ‌र्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के उस आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी, जिसमें एक पूर्व सैनिक को दिव्यांगता पेंशन देने का निर्देश दिया गया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि दिव्यांगता पेंशन दान या उदारता का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा में दिए गए बलिदान का सम्मान है।

यह पिछली सेवाओं के बदले मिलने वाले पारिश्रमिक का स्थगित हिस्सा है, जो निर्धारित शर्तें पूरी होने पर एक पक्का और कानूनी अधिकार बन जाता है।

पीठ ने कहा, “पेंशन का अधिकार संपत्ति जैसा है। इसे कानून के दखल के सिवा न तो रोका जा सकता है, न घटाया जा सकता है और न खत्म किया जा सकता है।”

पूर्व सैनिकों को जो बकाया पैसा कोर्ट के फैसले और सरकारी नीति से मिलना तय हो चुका है, उसे रोकना उनकी संपत्ति छीनने जैसा होगा और यह संविधान के अनुच्छेद 300ए का उल्लंघन माना जाएगा।

कोर्ट ने दोहराया कि दिव्यांगता पेंशन पाना एक महत्वपूर्ण अधिकार है और जब यह तय हो जाए कि पेंशन देनी है, तो उसका भुगतान उसी तारीख से किया जाना चाहिए जिस दिन से वह बनती है।

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