Andhra Pradesh High Court का अहम फैसला: पत्नी को मिला बीमार पति के बैंक खाते तक पहुंच का अधिकार, बताया अर्धांगिनी का कानूनी महत्व…

 आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 6 अप्रैल 2026 को एक अहम फैसला सुनाया, जिसमें एक Y.S.R. कडप्पा जिले की 59 वर्षीय नागम्मा को उसके पति के बैंक खाते में जमा पैसों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी।

दरअसल, नगमा के 65 वर्षीय पति लंबे समय से बेहोशी की हालत में थे और उन्हें मेडिकल देखभाल की जरूरत थी। चूंकि नागम्मा के पास पैसे खत्म हो चुके थे, इसलिए उनके मेडिकल इलाज या घर के बढ़ते खर्चों के लिए उनके पास कुछ भी नहीं बचा था।

नगमा के पति को CVA-left CG Hematoma बीमारी का पता चला है। सर्जरी के बाद भी उनकी मेडिकल हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है।

उन्हें सांस लेने के लिए एक ‘ट्रैकियोस्टोमी ट्यूब’ और खाना खिलाने के लिए एक ‘रायल ट्यूब’ की जरूरत पड़ती है। उनके नाम पर कुछ प्रॉपर्टीज हैं और उनके Axis Bank अकाउंट में 14.38 लाख रुपये जमा हैं, लेकिन बैंक नियमों के चलते पत्नी इन पैसों को नहीं निकाल सकती थी।

पत्नी ने किया कोर्ट का रुख

ऐसे में नागम्मा ने कोर्ट में यह केस दायर किया था, ताकि उन्हें मरीज का अभिभावक नियुक्त किया जा सके।

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने Care Convoy Rehabilitation के मेडिकल सुपरिटेंडेंट द्वारा जारी सर्टिफ़िकेट और New Life Rehab Hospital द्वारा जारी अन्य सर्टिफिकेट्स का हवाला दिया, जिनसे साफ़ जाहिर होता था कि मरीज़ फ़िलहाल एक तरह की बेहोशी या कोमा जैसी हालत में है।

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस वेंकटेश्वरलू निम्मागड्डा ने कहा कि पूरी तरह से अभिभावक बनने के अधिकार को सही ठहराना बिल्कुल साफ है।

उन्होंने कहा कि ‘जब कोई पति पूरी तरह से कोमा या वेजिटेटिव स्टेट (बेहोशी की हालत) में चला जाता है और सोचने-समझने, फैसले लेने या अपनी तरफ से कोई काम करने की क्षमता खो देता है, तो भारतीय प्राचीन दार्शनिक अवधारणा “अर्धांगिनी” (पत्नी को जीवन का दूसरा आधा हिस्सा मानने की सोच) को ध्यान में रखते हुए, उसकी अभिभावक के तौर पर काम करने के लिए पत्नी से ज्यादा स्वाभाविक, नैतिक या कानूनी तौर पर कोई और व्यक्ति उपयुक्त नहीं हो सकता।’

सरकार ने किया विरोध

आंध्र प्रदेश सरकार ने यह तर्क दिया कि यह याचिका ही सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि यह एक सिविल मामला है और इसलिए इसके लिए सिविल कोर्ट में जाना चाहिए, न कि आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में।

इस तर्क को खारिज कर दिया गया, क्योंकि हाई कोर्ट ने यह फैसला दिया कि “कोमा जैसी स्थिति” में पड़े व्यक्ति के लिए अभिभावक नियुक्त करवाने हेतु अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में आना उनका अधिकार है।

इसके अनुसार, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने उनकी याचिका मंज़ूर कर ली और उन्हें उनके बैंक खाते को ऑपरेट करने का अधिकार दे दिया।

हाई कोर्ट ने उन्हें आगे यह निर्देश भी दिया कि वे एक साल की अवधि तक, या जब तक कोई अन्य बड़ी या मेडिकल घटना न हो जाए (इनमें से जो भी कम हो), हर तीन महीने में अपडेटेड पासबुक/खाते का स्टेटमेंट पेश करें।

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