वर्षा वर्मा (समाज सेविका -लखनऊ, उत्तरप्रदेश):
पितृपक्ष हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सेवा का पावन अवसर है। ऐसी मान्यता है कि इस अवधि में किया गया दान, हवन सामग्री का दान, लकड़ी का दान, श्रमदान तथा जरूरतमंदों की सेवा विशेष पुण्यकारी होती है।
किसी बेसहारे के अंतिम संस्कार में सहयोग
जब हम किसी ऐसे व्यक्ति के अंतिम संस्कार में सहयोग करते हैं, जिसका कोई अपना नहीं है, तो यह केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और करुणा का सर्वोच्च उदाहरण बन जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी असहाय या लावारिस व्यक्ति के अंतिम संस्कार तथा उसकी आत्मा की शांति के लिए किए गए कर्मों से हमारे पितरों की भी प्रसन्नता प्राप्त होती है। यह सेवा हमें अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य और मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का स्मरण कराती है।
घर में शांति और सकारात्मकता की भावना
जिन लोगों का अंतिम संस्कार उचित विधि से नहीं हो पाता, उनके लिए धार्मिक परंपराओं में शांति पाठ, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्मों का उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यता है कि इन विधियों के माध्यम से दिवंगत आत्मा के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है और परिवार को भी मानसिक शांति एवं संतोष प्राप्त होता है।
निष्काम सेवा — सबसे बड़ा मानवीय कर्म
यह ऐसी सेवा है, जिसमें सहायता पाने वाला व्यक्ति शायद आपको कभी धन्यवाद भी न दे पाए। उसका परिवार आपको जानता तक नहीं होगा। फिर भी आप केवल मानवता, कर्तव्य और धर्म की भावना से अपना योगदान देते हैं।
इसी भावना को निष्काम कर्म कहा जाता है—ऐसा कर्म, जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं, बल्कि सेवा और कर्तव्य की भावना सर्वोपरि होती है।
हमारी संस्था की त्रिवेणी सेवा
हमारी संस्था “एक कोशिश ऐसी भी” इसी मानवीय भावना के साथ सेवा की एक त्रिवेणी को आगे बढ़ा रही है—
- शिक्षा दान — जीवन को दिशा देना
- रक्तदान — जीवन बचाना
- मोक्ष दान — जीवन के पश्चात सम्मानजनक अंतिम संस्कार में सहयोग देना
पितृपक्ष में किया गया दान हमारे लिए केवल दान नहीं, बल्कि मानवता के प्रति श्रद्धा और सेवा का संकल्प है।
शास्त्रीय मान्यताओं में अंतिम संस्कार का महत्व
धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में असहाय एवं बेसहारा व्यक्ति के अंतिम संस्कार को महत्वपूर्ण पुण्य कर्म माना गया है। ऐसी मान्यता है कि किसी ऐसे व्यक्ति का अंतिम संस्कार करना, जिसके लिए कोई आगे आने वाला नहीं है, अत्यंत पुण्यकारी सेवा है।
अंतिम संस्कार केवल शरीर का दाह संस्कार करने तक सीमित नहीं माना जाता। धार्मिक परंपराओं में दिवंगत के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए पिंडदान, तर्पण और शांति पाठ जैसी विधियों का भी महत्व बताया गया है।
लावारिस व्यक्ति की पहचान या परिवार की जानकारी उपलब्ध न होने की स्थिति में धार्मिक परंपराओं के अनुसार उसके लिए सामूहिक अथवा सर्व-पितृ भाव से प्रार्थना और शांति कर्म किए जाते हैं। इसका मूल उद्देश्य दिवंगत व्यक्ति को सम्मानपूर्वक विदाई देना और उसके प्रति अपनी मानवीय जिम्मेदारी निभाना है।
सेवा का संकल्प
इसी सेवा भावना के अंतर्गत बाराबंकी स्थित मातृ पितृ वृद्ध आश्रम के बुजुर्गों के निधन के पश्चात उनके सम्मानजनक अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी हमारी संस्था ने अपने कंधों पर ली है।
हमारा प्रयास है कि कोई भी व्यक्ति इस संसार से विदा लेते समय अकेला, उपेक्षित या बेसहारा न रहे।
आइए, पितृपक्ष के इस पावन अवसर पर हम श्रद्धा, सेवा और मानवता का संकल्प लें और उन लोगों के लिए भी आगे आएँ, जिनके लिए कोई अपना नहीं है।
प्रभु सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें और हमें सदैव सेवा के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।