सिविल रजिस्ट्रेशन से जुड़े कानून में प्रस्तावित बदलाव के तहत जो लोग दो साल के अंदर जन्म और मृत्यु की जानकारी अधिकारियों को नहीं देते हैं उन्हें रजिस्ट्रेशन की ज्यादा सख्त प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
केंद्र ने प्रस्ताव दिया है कि दो साल बाद बताई गई जन्म और मृत्यु की घटनाओं का रजिस्ट्रेशन सिर्फ फर्स्ट-क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही हो सकेगा। यह मौजूदा नियम की जगह लेगा जिसके तहत ऐसे मामलों को डीएम, एसडीएम या एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट मंजूरी दे सकते थे।
गृह मंत्रालय के सामने रखा गया प्रस्ताव
गृह मंत्रालय की तरफ से लाए गए जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रेशन एक्ट में इस प्रस्तावित बदलाव को बुधवार को कैबिनेट के सामने रखा गया। इस प्रस्ताव की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि इसका मकसद देर से होने वाले रजिस्ट्रेशन के नियमों को सख्त करना और जन्म-मृत्यु का रिकॉर्ड लगभग रियल-टाइम में दर्ज करना है, जो पॉलिसी बनाने और कामकाज चलाने के लिए बहुत जरूरी है। इससे ज्यादा जांच-पड़ताल के जरिए गलत इस्तेमाल को भी रोका जा सकेगा।
कितना बदल जाएगा नियम
हर जन्म और मृत्यु का रजिस्ट्रेशन डिजिटल सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) के जरिए 21 दिनों के अंदर लोकल रजिस्ट्रार के पास कराना जरूरी है। अगर 30 दिन के बाद लेकिन एक साल के अंदर जानकारी दी जाती है तो रजिस्ट्रेशन तभी हो सकता है जब डिस्ट्रिक्ट रजिस्ट्रार या किसी दूसरे तय अधिकारी की लिखित मंजूरी हो, तय फीस जमा की जाए और खुद से अटेस्ट किया हुआ डॉक्यूमेंट जमा किया जाए।
सेक्शन 13(3) के तहत अभी एक साल से ज्यादा की देरी होने पर संबंधित अधिकार क्षेत्र वाले डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, एसडीएम या एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट से मंजूरी ली जा सकती है। प्रस्तावित बदलाव में दो साल तक की देरी के लिए यह व्यवस्था बनी रहेगी।