ओपेक से यूएई का बाहर होना: सऊदी-पाकिस्तान फैक्टर ने कैसे बदला पूरा समीकरण?…

ओपेक को लगभग 60 साल बाद छोड़ने का फैसला यूएई ने अचानक नहीं लिया, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से पनप रहा असंतोष है।

अबू धाबी को लगातार यह खटक रहा था कि सऊदी अरब ओपेक के जरिए उत्पादन को नियंत्रित करता है और यूएई को अपनी क्षमता के हिसाब से ज्यादा तेल निकालने नहीं देता। जब यूएई ज्यादा उत्पादन करना चाहता था, तब सऊदी कम उत्पादन पर जोर देता रहा, जिससे दोनों के बीच तनाव बढ़ता गया।

इस तनाव को और हवा तब मिली जब पाकिस्तान की भूमिका सामने आई। यूएई को पाकिस्तान का रवैया बिल्कुल पसंद नहीं आया, खासकर तब जब वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा था। यूएई का साफ मानना था कि इस समय बीच का रास्ता नहीं, बल्कि साफ पक्ष लेना जरूरी है।

उसे लगा कि पाकिस्तान न तो ईरान के हमलों पर खुलकर विरोध कर रहा है और न ही खाड़ी देशों के साथ मजबूती से खड़ा है। यही वजह रही कि अबू धाबी के भीतर नाराजगी गहराती गई।

ओपेक से बाहर निकलते ही यूएई को क्या मिलेगा फायदा

1967 से ओपेक का हिस्सा रहा यूएई अब इस बंधन से आजाद होकर अपनी शर्तों पर खेल सकेगा। सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब वह तेल उत्पादन पर किसी कोटा या दबाव में नहीं रहेगा।

वह जितना चाहे उतना उत्पादन कर सकता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से प्रतिक्रिया देकर मुनाफा कमा सकता है। इस फैसले से सऊदी अरब की पकड़ भी कमजोर होगी, क्योंकि ओपेक के भीतर उसकी जो कमांड थी, उस पर सीधा असर पड़ेगा।

साथ ही यूएई खुद को अमेरिका के और करीब लाने की कोशिश कर रहा है, खासकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जैसे नेताओं के साथ, जो पहले से ही ओपेक के आलोचक रहे हैं।

तेल बाजार के आंकड़े भी इस बदलाव की गंभीरता दिखाते हैं। ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के बाद ओपेक की कुल आपूर्ति में भारी गिरावट आई है। ऐसे समय में यूएई का बाहर निकलना न सिर्फ इस संगठन के लिए झटका है, बल्कि वैश्विक बाजार में नए समीकरण बनाने वाला कदम भी है।

खाड़ी में अकेला पड़ता यूएई

ईरान के हमलों के दौरान यूएई को उम्मीद थी कि खाड़ी देश एकजुट होकर जवाब देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। खाड़ी सहयोग परिषद की बैठकों में भी कोई ठोस सामूहिक फैसला नहीं निकल सका। यूएई, जो ईरान के सबसे बड़े निशानों में से एक रहा और जिस पर 2200 से ज्यादा ड्रोन और मिसाइल हमले हुए, उसे राजनीतिक समर्थन की कमी महसूस हुई।

जब उसे लगा कि कोई खुलकर साथ नहीं देगा, तो उसने आर्थिक स्तर पर भी अलग रास्ता चुन लिया। यही वजह है कि बिना किसी पूर्व चर्चा के उसने ओपेक छोड़ने का ऐलान कर दिया। यह कदम साफ संकेत देता है कि अब यूएई ब्लाक की राजनीति से निकलकर खुद की ताकत पर भरोसा करना चाहता है।

सऊदी-पाक रिश्तों पर सीधा असरइस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान का जिक्र बेहद अहम है। यूएई पहले ही इस महीने पाकिस्तान से 3.5 अरब डालर की जमा राशि वापस ले चुका है, जो उसके विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा था। यह कदम साफ तौर पर नाराजगी का संकेत था। इसके बाद सऊदी अरब को पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आना पड़ा, जिससे दोनों के बीच की नजदीकी और साफ हो गई।

विश्लेषकों का मानना है कि यूएई को सऊदी-पाक गठजोड़ अपने हितों के खिलाफ लगता है, खासकर तब जब यूएई भारत में ज्यादा निवेश और रणनीतिक रिश्ते मजबूत कर रहा है। ऐसे में ओपेक से बाहर निकलना सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि इस गठजोड़ को तोड़ने की बड़ी रणनीति भी है। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत को मिल सकता है।

जब यूएई ज्यादा तेल उत्पादन करेगा, तो बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम होगा। इसका सीधा असर भारत के आयात बिल और महंगाई पर पड़ेगा, जिससे देश को आर्थिक राहत मिल सकती है। कुल मिलाकर यूएई का यह फैसला सिर्फ एक संगठन छोड़ने का मामला नहीं है, बल्कि यह तेल, ताकत और वैश्विक राजनीति के नए समीकरण बनाने की शुरुआत है जहां अबू धाबी साफ संदेश दे चुका है कि वह किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर खेलना चाहता है।

तेल आपूर्ति पर दबाव के बीच कीमतों में हल्की नरमी

वैश्विक तेल बाजार इस समय सबसे ज्यादा तेल आपूर्ति के संतुलन पर टिका हुआ है और इसी वजह से कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। यूएई के ओपेक छोड़ने के फैसले ने भविष्य में आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन फिलहाल बाजार में वास्तविक आपूर्ति अभी भी दबाव में है।

यही कारण है कि कई दिनों की तेजी के बाद कीमतों में हल्की नरमी तो आई, लेकिन गिरावट बहुत सीमित रही। विश्लेषकों का मानना है कि ओपेक के बंधन से बाहर आने के बाद यूएई भविष्य में ज्यादा तेल बाजार में उतार सकेगा, जिससे आपूर्ति मजबूत होगी। लेकिन यह प्रक्रिया तुरंत असर नहीं दिखाएगी, क्योंकि उत्पादन बढ़ाने और उसे बाजार तक पहुंचाने में समय लगता है।

होर्मुज पर संकट, आपूर्ति की नस पर दबाव

तेल आपूर्ति पर सबसे बड़ा असर होर्मुज में जारी संकट का है, जिसे दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन माना जाता है। ईरान द्वारा इस अहम रास्ते को बंद करने से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ है। इसके साथ ही अमेरिका ईरान के बंदरगाहों पर दबाव बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, जिससे हालात और सख्त हो सकते हैं।

ऐसे में बाजार को यह डर सता रहा है कि आपूर्ति में बाधा लंबी खिंची तो कीमतें फिर से तेजी पकड़ सकती हैं। यानी एक तरफ भविष्य में बढ़ती आपूर्ति की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ वर्तमान में जारी रुकावटें कीमतों को नीचे आने से रोक रही हैं।

भंडार घटने से बढ़ी चिंता, आपूर्ति और तंग

तेल आपूर्ति पर दबाव का असर अमेरिका के भंडार में भी दिख रहा है। वहां कच्चे तेल का स्टाक लगातार दूसरी बार घटा है, जिससे संकेत मिलता है कि बाजार में उपलब्ध आपूर्ति कम हो रही है। कच्चे तेल के भंडार में करीब 17.9 लाख बैरल की कमी आई है, जबकि पेट्रोल और डीजल के भंडार में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।

भंडार में गिरावट साफ बताती है कि मांग बनी हुई है, लेकिन आपूर्ति उतनी तेजी से नहीं बढ़ पा रही। यही वजह है कि कीमतों में बड़ी गिरावट नहीं आ रही, बल्कि हल्की नरमी के बावजूद बाजार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।

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