28 फरवरी को मध्य-पूर्व में शुरू हुए संघर्ष ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को हिला दिया।
मिसाइलें, बारूदी सुरंगें, जहाजों पर हमले और अमेरिका की नाकेबंदी के बीच ईरान की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया गया। दुनिया के कच्चे तेल व्यापार का पांचवां हिस्सा इसी संकरे जलडमरूमध्य से गुजरता है।
LPG और LNG की आपूर्ति भी बुरी तरह प्रभावित हुई। भारत, जिसकी अर्थव्यवस्था 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इस संकट का सामना सबसे बेहतर तरीके से कर रहा है।
अमेरिका, चीन और जापान जैसे देशों के मुकाबले भारत के पास बड़े रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार नहीं हैं, लेकिन विविधीकरण की रणनीति और रूस के साथ मजबूत संबंधों ने इसे संभव बनाया।
सरकार के पास 60 दिनों का स्टॉक
सरकार के अनुसार, रणनीतिक भंडार समेत विभिन्न रूपों में भारत के पास करीब 60 दिनों की पेट्रोलियम आपूर्ति उपलब्ध है। युद्ध के ढाई महीनों में दुनिया की 20 प्रतिशत कच्चे तेल आपूर्ति बाधित रहने के बावजूद भारत ने अपनी जरूरतें पूरी की हैं। सवाल उठता है कि भारत अपना तेल कहां से ला रहा है?
आयात रणनीति में बड़ा बदलाव
Kpler में मॉडलिंग और रिफाइनिंग के मैनेजर सुमित रितोलिया के अनुसार, मार्च 2026 से भारत की कच्चे तेल आयात रणनीति में कई बदलाव आया है।
होर्मुज़ में बाधाओं के चलते मध्य-पूर्व से आपूर्ति घटी और लॉजिस्टिक्स जोखिम बढ़ गए। भारतीय रिफाइनरों ने अटलांटिक बेसिन और होर्मुज़ से इतर स्रोतों की ओर तेजी से रुख किया।
इराक और खाड़ी देशों से कम आपूर्ति की भरपाई अमेरिका, ब्राजील, पश्चिम अफ्रीका और वेनेजुएला से बढ़ी खरीदारी से हुई। यह कोई एक स्रोत की जगह नहीं ले रहा, बल्कि उपलब्धता, रिफाइनरी अनुकूलता, ढुलाई लागत और प्रतिबंधों को ध्यान में रखकर कच्चे तेल के मिश्रण का व्यापक पुनर्गठन है।
रितोलिया ने बताया, ‘रिफाइनर रूसी और अटलांटिक बेसिन के तेल के अधिक खरीदार बने हैं। साथ ही जहां उपलब्ध हो, सऊदी और UAE के उन ग्रेड्स को भी खरीद रहे हैं जिन्हें पहले नजरअंदाज किया जाता था।’
रूसी तेल: आपूर्ति की रीढ़
2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस भारत के कच्चे तेल आयात में प्रमुख बना हुआ है। ट्रंप प्रशासन के प्रतिबंधों से दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 तक थोड़ी कमी आई, लेकिन रूसी तेल सबसे बड़ा हिस्सा बना रहा। मार्च 2026 में अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने पर रूसी आपूर्ति फिर से पुराने उच्च स्तर पर पहुंच गई।
इस बार तेल प्रीमियम कीमत पर खरीदा जा रहा है क्योंकि वैश्विक कीमतें ऊंची हैं। ट्रंप प्रशासन ने वैश्विक कीमतों को स्थिर रखने के लिए समुद्री रास्ते के रूसी तेल पर अस्थायी छूट दी, जिसे दो बार संशोधित किया जा चुका है।
भारत ने स्पष्ट किया कि उसका खरीद निर्णय ऊर्जा सुरक्षा और अर्थशास्त्र पर आधारित है। Rosneft और Lukoil जैसी कंपनियों से खरीदारी आर्थिक रूप से फायदेमंद रही। Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में रूसी आयात 1.9-2.0 मिलियन बैरल प्रतिदिन (Mbd) तक पहुंच गया।
मई में भी यह स्तर 1.9 Mbd के आसपास बना हुआ है। युद्ध शुरू होने के बाद रूस ने भारत को 140 मिलियन बैरल से ज्यादा तेल सप्लाई किया है। Baltic, Black Sea या Pacific मार्ग से आने वाला रूसी तेल होर्मुज़ जोखिम से पूरी तरह सुरक्षित है।
मध्य-पूर्व आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते
अप्रैल में भारत का कुल कच्चा तेल आयात घटकर 4.4 mbpd रह गया, जबकि सामान्य स्तर 5.2 mbpd था। इराक से आयात लगभग शून्य हो गया। ग्रांट थॉर्नटन भारत के ऑयल एंड गैस पार्टनर सौरव मित्रा बताते हैं कि रिफाइनरों ने नया मिश्रण अपनाया जिसमें रूस 30-37 प्रतिशत (1.5-1.7 mbpd) के साथ सबसे आगे रहा।
सऊदी अरब (0.65-0.70 mbpd), UAE (0.60-0.62 mbpd), वेनेजुएला, ब्राजील और ईरान से भी आपूर्ति हुई। मध्य-पूर्व तेल सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन (यानबू, लाल सागर) और UAE की हबशान-फुजैराह पाइपलाइन से भेजा जा रहा है। इन बाईपास रूट्स से आपूर्ति जारी है, हालांकि इसमें 4-10 दिन अतिरिक्त लगते हैं और ढुलाई लागत बढ़ जाती है।
वेनेजुएला की वापसी
प्रतिबंधों के बाद बंद हुई वेनेजुएला आपूर्ति ट्रंप प्रशासन के कदमों के बाद फिर शुरू हुई। अप्रैल-मई में यह तेजी से बढ़ी और अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद वेनेजुएला टॉप 5 सप्लायर्स में शामिल हो गया। रितोलिया कहते हैं कि वेनेजुएला के ग्रेड भारत के जटिल रिफाइनरों के लिए आकर्षक हैं। वे हल्के तेल के मिश्रण को संतुलित करते हैं और मिडिल डिस्टिलेट उत्पादन बढ़ाते हैं।
वैश्विक कमी और चुनौतियां
Kpler के अनुसार, भारत का आयात सामान्य स्तर से 700-800 kbd कम है। वैश्विक कमी और होर्मुज़ बाधा के कारण एशिया में तेल प्रवाह सीमित रहा। रितोलिया चेताते हैं कि नए स्रोत पूरी तरह मध्य-पूर्व की कमी की भरपाई नहीं कर पा रहे। भविष्य में मिश्रण मौजूदा पैटर्न पर ही रहने की संभावना है। रूस मुख्य आधारशिला बना रहेगा, जिसकी पूर्ति अटलांटिक बेसिन और वेनेजुएला से होगी। रिफाइनर सप्लाई सुरक्षा, बेहतर उपयोग और लागत को प्राथमिकता देंगे।
सरकार की घरेलू रणनीति
अनावश्यक मांग कम करने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3.90 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। चार साल बाद हुई यह बढ़ोतरी रिफाइनरों के नुकसान की आंशिक भरपाई करती है और खपत को नियंत्रित करती है। सरकार ने ‘विंडफॉल गेन्स टैक्स’ भी लगाया है ताकि रिफाइनर पेट्रोल-डीजल का निर्यात कम करें और घरेलू जरूरतें सुनिश्चित हों।