होर्मुज केवल ट्रेलर था, असली तस्वीर मलक्का है: ट्रंप का ट्रिपल अटैक, क्या चीन मुश्किल में फंस गया?…

ईरान के साथ अमेरिका की लड़ाई किसी कूटनीतिक चाल से कम नहीं है। अमेरिका जो दिखाना चाह रहा है, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक ट्रंप के मंसूबे नजर आ रहे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की निगाहें होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait Of Hormuz) के बाद अब मलक्का जलडमरूमध्य (Strait Of Malacca) पर टिकी हैं। ईरान के साथ लड़ाई में मलक्का की एंट्री अचानक नहीं हुई है, इसके पीछे राष्ट्रपति ट्रंप की सोची-समझी रणनीति सामने आ रही है।

अमेरिका ने इस साल की शुरुआत से ही एक-एक करके कई देशों को अपने निशाने पर लिया है और ये पूरी जंग तेल को लेकर ही खड़ी हुई है। लेकिन इस मुद्दे के बीच ये सवाल है कि आखिर यूनाइटेड स्टेट्स इन सभी हमलों से सीधे तौर पर कहां निशाना साध रहा है।

कहीं पे निगाहें, कहीं पर निशाना

अमेरिका ने इस साल की शुरुआत में जहां पहले वेनेजुएला पर हमला किया, फिर ग्रीनलैंड को धमकी दी और 28 फरवरी को ईरान के साथ युद्ध छेड़ दिया और अब ट्रंप की नजर मलक्का पर टिकी हैं। लेकिन इन हमलों के पीछे अब ट्रंप की गहरी प्लानिंग नजर आ रही है।

ट्रंप के निशाने पर वेनेजुएला या ईरान नहीं, बल्कि चीन है। ट्रंप ने चीन को चारों तरफ से घेरने का प्लान बनाया है। जानकारों का कहना है कि इससे पता चलता है कि US के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के पास एक प्लान है, हालांकि ज्यादातर आलोचक इससे शायद सहमत न हों।

ट्रंप के इस प्लान का मकसद चीन पर सीधे मिलिट्री टकराव के बजाय, तेल सप्लाई लाइनों को दबाकर रणनीतिक बढ़त हासिल करना है।

इसका आइडिया यह है कि एनर्जी की सप्लाई रोककर, धीरे-धीरे बढ़ते दबाव के जरिए, बीजिंग को जाने वाली कच्चे तेल की शिपिंग लाइनों को पूरी तरह से रोक देना। वेनेजुएला एक टेस्ट केस था, ईरान ने इस रणनीति को और बढ़ाया, वहीं मलक्का, शायद इसे पक्का कर देगा।

वेनेजुएला पर हमले से चीन पर ‘इनडायरेक्ट अटैक’

अमेरिका ने जनवरी 2026 में वेनेजुएला पर हमला किया और अमेरिकी सेना इस देश के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को कैद करके अपने साथ ले गई।

अमेरिका ने वेनेजुएला में इस रणनीति को बहुत सफाई से अंजाम दिया और अब US का वेनेजुएला के 300 अरब बैरल से ज्यादा तेल पर कंट्रोल है। लेकिन वेनेजुएला पर हमले से पहले स्थिति ये नहीं थी।

जनवरी की शुरुआत में वेनेजुएला की राजधानी कराकास में हुए हमले से पहले, चीन प्रतिबंधित वेनेजुएला का कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार था। वेनेजुएला में हर दिन करीब 9,21,000 बैरल तेल का उत्पादन होता था, जिसका 50 से 80 प्रतिशत तेल चीन ही खरीदता था।

इस तेल का अधिकांश हिस्सा ‘टीपॉट रिफाइनरियों’ में जाता था, जो कि चीन के पूर्वी तट पर स्थित प्रांत शेडोंग क्षेत्र में स्थित छोटे पैमाने की इकाइयां हैं, जो भू-राजनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती हैं और सस्ते में खरीदे गए कच्चे तेल को परिष्कृत करके महत्वपूर्ण बफर स्टॉक बनाती हैं।

बीजिंग ने पहले ही खतरे को भांप लिया था, इसी वजह से उसने 2025 के आखिर में लाखों बैरल तेल पहले ही वहां से निकल लिया था। बाजार विश्लेषक Kpler के मुताबिक, चीन का वेनेजुएला से खरीदा हुआ लगभग 43 मिलियन बैरल तेल रास्ते में भी जमा था।

वेनेजुएला के तेल पर अमेरिका के अधिकार से चीन पर इनडारेक्ट अटैक हुआ, क्योंकि अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया है।

ईरान के जाल में फंसा अमेरिका

अमेरिका ने फरवरी 2026 के अंतिम दिन 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया। इस हमले का कारण भी ‘तेल’ ही था। लेकिन ईरान ने अमेरिका को उसी के जाल में फंसा दिया और होर्मुज को ढाल बनाकर लड़ाई की कमान को अपने हाथ में ले लिया।

अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत इजरायल के साथ मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर इतना बड़ा हमला किया कि इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के साथ कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत हो गई। लेकिन ईरान ने अमेरिका-इजरायल दोनों देशों को इस हमले का जवाब दिया।

अमेरिका को उम्मीद थी कि ये लड़ाई जल्द ही खत्म हो जाएगी, लेकिन ईरान ने US को अपने जाल में फंसा लिया और अमेरिका किसी भी तरह इस युद्ध को खत्म करने की कोशिश कर रहा है।

ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया और इस पर कब्जा करके अमेरिका को जाल में फंसाता चला गया। ईरान ने होर्मुज से उन्हीं जहाजों को जाने दिया, जिन्हें वह निकलने देना चाहता था।

ईरान ने दावा किया कि उसने होर्मुज में पानी के अंदर बारूदी सुरंग बिछा रखी हैं, जिसका रिमोट कंट्रोल उसके पास है। इससे जहाजों का निकलना, ईरान की मर्जी के बिना काफी मुश्किल हो गया।

अमेरिका ने इसके बाद होर्मुज पर अपना अधिकार जमाने के लिए अमेरिकी नौसेना को भेजा और राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने ईरानी नौसेना के जहाज तबाह कर दिए हैं और बारूदी सुरंग के खात्मे का काम भी शुरू कर दिया है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि हम दुनिया के लोगों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सुरक्षित रास्ता देंगे, जिससे जहाज बिना किसी रुकावट के या डर के गुजर सकें।

क्या है मलक्का की कहानी?

मलक्का जलडमरूमध्य, इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित है। यह सिर्फ एक और शिपिंग मार्ग नहीं, बल्कि खाड़ी और अफ्रीका से पूर्वी एशिया की ओर जाने वाली ऊर्जा आपूर्ति के लिए यह सबसे छोटा और सबसे सस्ता मार्ग है और ठीक इसी निर्भरता ने लंबे समय से बीजिंग को चिंतित कर रखा है।

चीनी योजनाकारों के लिए, इससे समीकरण ही बदल जाता है। भविष्य में किसी भी संकट की स्थिति में चाहे वह ताइवान को लेकर हो, दक्षिण चीन सागर को लेकर हो या फिर मध्य पूर्व से फैलने वाले तनाव के कारण हो, बीजिंग को यह मानकर चलना होगा कि उसकी ऊर्जा की महत्वपूर्ण आपूर्ति पर अमेरिका और इस क्षेत्र में उसके सहयोगी वास्तविक समय में नजर रख सकते हैं और उसकी निगरानी कर सकते हैं।

चीन के लिए क्यों जरूरी मलक्का?

चीन के तेल आयात का करीब 80% हिस्सा इसी संकरे गलियारे से होकर गुजरता है। इसी निर्भरता ने लंबे समय से बीजिंग को चिंता में डाला है।

साल 2003 में, तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने ‘मलक्का दुविधा (Malacca Dilemma)’ शब्द गढ़ा था। यह एक स्पष्ट स्वीकारोक्ति थी कि चीन का आर्थिक उत्थान एक ऐसे समुद्री ‘चोकपॉइंट’ (संकरा मार्ग) से जुड़ा था जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था।

किसी संकट की स्थिति में, इस जलमार्ग की निगरानी की जा सकती थी, इसे बाधित किया जा सकता था या प्रतिद्वंद्वी शक्तियों की तरफ से इसे पूरी तरह से अवरुद्ध भी किया जा सकता था। दो दशक बाद भी, चीन के लिए यह जलमार्ग संवेदनशील बना हुआ है।

मध्य एशिया और रूस से आने वाली पाइपलाइनों, म्यांमार के रास्ते बनने वाले मार्गों और विदेशों में बंदरगाहों के एक नेटवर्क, जिसे अक्सर ‘मोतियों की माला (String of Pearls)’ कहा जाता है, इन सभी में भारी निवेश के बावजूद, चीन की अधिकांश ऊर्जा आपूर्ति अभी भी समुद्र के रास्ते और विशेष रूप से मलक्का जलडमरूमध्य से ही होती है।

मलक्का पर अमेरिका-इंडोनेशिया के बीच डील

अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के साथ बातचीत के बाद, वॉशिंगटन और इंडोनेशिया के बीच एक बड़ी रक्षा सहयोग साझेदारी पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। कागजों पर, यह समझौता समुद्री सुरक्षा, संयुक्त प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर केंद्रित है।

अमेरिका-इंडोनेशिया की नई साझेदारी को समुद्री क्षेत्र की जागरूकता बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें सतह और पानी के नीचे होने वाली गतिविधियों की निगरानी के साथ-साथ संयुक्त अभ्यास और विशेष बलों के बीच सहयोग भी शामिल है।

चीन के पास क्या हैं ऑप्शन?

अमेरिका अगर चीन के खिलाफ मलक्का जलडमरूमध्य का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर करने की कोशिश करता है, तो चीन के पास कई ऐसे विकल्प मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल करके वह इस गंभीर स्थिति से निपट सकता है।

  • पहला- कच्चे तेल की आपूर्ति के मार्ग को बदलकर उसे जमीन के रास्ते मंगाया जाए। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह जमीनी मार्ग समुद्र के रास्ते होने वाली आपूर्ति में आई कमी की भरपाई पूरी तरह से कब तक कर पाएगा। लेकिन दूरदर्शी सोच रखने वाले बीजिंग ने इस दिशा में पिछले कई सालों से काम करना शुरू कर दिया था।
  • दूसरा- दुनिया के ‘शैडो टैंकर फ्लीट’ (अदृश्य टैंकर बेड़े) पर अपनी पहले से ही मजबूत पकड़ को और बढ़ाना। मलक्का के मामले में यह इलाका कानूनी अस्पष्टता वाले क्षेत्र में जा सकता है, जिससे समुद्री सुरक्षा से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं, खासकर ऐसे इलाके में जहां समुद्री डकैती पहले से ही एक बड़ी चिंता है।
  • तीसरा- बीजिंग जकार्ता, कुआलालंपुर और सिंगापुर में से किसी एक या सभी पर दबाव डाल सकता है। इसका मकसद इन तीनों के बीच या फिर इनके और अमेरिका के बीच फूट डालना हो सकता है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग का वही आजमाया हुआ तरीका होगा, जो कि बीजिंग ने श्रीलंका के बंदरगाहों तक अहम पहुंच पाने के लिए अपनाया था। उदाहरण के लिए, इसी पहुंच की बदौलत बीजिंग भारत पर नजर रख पाता है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा ‘आपातकालीन तेल भंडार’ मौजूद है, जिसमें 1.3 अरब बैरल से भी ज्यादा तेल जमा है।

भारत की दृष्टि से कितना जरूरी मलक्का?

मलक्का के आसपास बदलती हुई परिस्थितियां भारत को एक अहम स्थिति में खड़ा कर रही हैं। भारत के पश्चिमी हिस्से के करीब स्थित अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, भारत को इस इलाके में समुद्री यातायात पर नजर रखने के लिए एक प्राकृतिक और बेहतरीन निगरानी केंद्र के तौर पर है।

इसके अलावा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर मौजूद सैन्य बुनियादी ढांचा, जिसमें कैंपबेल बे स्थित एक हवाई अड्डा भी शामिल है, भारत को समुद्री जहाजों के अहम रास्तों पर निगरानी रखने में सक्षम बनाता है।

भारत की समुद्री क्षमताएं पहले से ही इस इलाके में मजबूत हैं। वहीं अमेरिका और भारत एक भरोसेमंद सैन्य और कूटनीतिक सहयोगी बन सकते हैं जो इस इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने का काम लगातार जारी रख सकते हैं।

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