दुनिया इस समय बड़े ऊर्जा संकट का सामना कर रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि यह संकट पिछले कई दशकों के सभी बड़े संकटों से भी ज्यादा गंभीर हो सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख फातिह बिओरल ने कहा है कि मौजूदा तेल और गैस संकट 1973, 1979 और 2002 के संकटों को मिलाकर भी ज्यादा गंभीर है। उन्होंने एक फ्रांसीसी अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि दुनिया ने इससे पहले इतनी बड़ी ऊर्जा आपूर्ति बाधा कभी नहीं देखी।
उन्होंने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट के कारण वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर बड़ा असर पड़ा है। इस वजह से तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। इस संकट के कारण कई देशों में महंगाई बढ़ने का खतरा है, क्योंकि ऊर्जा महंगी होने से हर चीज की कीमत पर असर पड़ता है।
किन देशों पर सबसे ज्यादा असर?
फातिह बिओरल ने कहा कि यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश भी इस संकट से प्रभावित होंगे, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान विकासशील देशों को होगा।
इन देशों में पहले से ही आर्थिक दबाव ज्यादा होता है, और अब तेल-गैस महंगे होने से खाने-पीने की चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं। इससे महंगाई और तेज हो सकती है। यानी आम लोगों की जेब पर इसका सीधा असर पड़ेगा, खासकर उन देशों में जहां आय कम है और ऊर्जा पर निर्भरता ज्यादा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना संकट की वजह
दरअसल, ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही लगभग रोक दी है। यह दुनिया का एक बेहद अहम समुद्री रास्ता है, जहां से करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस की सप्लाई होती है।
इस रास्ते के बंद होने से वैश्विक बाजार में तेल और गैस की कमी हो गई है, जिससे कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इसका असर सिर्फ ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
संकट से निपटने के प्रयास
इस स्थिति से निपटने के लिए IEA के सदस्य देशों ने अपने रणनीतिक भंडार (रिजर्व) से तेल निकालने का फैसला किया है। कुछ तेल पहले ही बाजार में जारी किया जा चुका है और यह प्रक्रिया अभी जारी है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो यह संकट और गहरा सकता है।