अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने दावा किया कि अफगानिस्तान में नाटो सैनिक फ्रंटलाइन से थोड़ा पीछे हट गए थे।
उन्होंने सवाल किया कि अगर अमेरिका को कभी उनकी जरूरत पड़ी तो क्या नाटो वहां होगा।
उन्होंने दावोस में एक मीडिया संस्थान से बातचीत में कहा, “मैंने हमेशा कहा है अगर हमें कभी उनकी जरूरत पड़ी तो क्या वे वहां होंगे? यही असली टेस्ट है और मुझे इस बारे में पक्का नहीं पता। मुझे पता है कि हम वहां होते या हम वहां होंगे, लेकिन क्या वे वहां होंगे?”
अमेरिका ने लागू किया था आर्टिकल 5
9/11 हमलों के बाद अमेरिका पहला नाटो सदस्य देश था जिसने आर्टिकल 5 लागू किया, जिसमें कहा गया है कि एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा।
नाटो सहयोगियों ने 20 सालों तक अफगानिस्तान में अमेरिका के साथ लड़ाई लड़ी, लेकिन ट्रंप बार-बार इसे नजरअंदाज करते रहे हैं।
‘वो पीछे हट गए’
उन्होंने जोर देकर कहा, “हमें उनकी कभी जरूरत नहीं पड़ी। हमने उनसे कभी कुछ नहीं मांगा। आप जानते हैं, वे कहेंगे कि उन्होंने अफगानिस्तान में कुछ सैनिक भेजे थे और उन्होंने भेजे भी थे – वे थोड़ा पीछे रहे, फ्रंट लाइन से थोड़ा दूर।”
बता दें कि 20 साल तक चले युद्ध के दौरान नाटो के 3,486 सैनिक मारे गए, जिनमें से 2,461 अमेरिकी सैनिक थे। कनाडा और ग्रीनलैंड में क्रमशः 165 और 44 मौतें हुईं।
ब्रिटेन दिया ये जवाब
उनके बयानों से यूके के सांसदों में गुस्सा है। प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के प्रवक्ता ने कहा, “उनका और दूसरी नाटो सेनाओं का बलिदान सामूहिक सुरक्षा की सेवा में और हमारे सहयोगी पर हुए हमले के जवाब में दिया गया था।”
उन्होंने आगे कहा, “हमें अपनी सेना पर बहुत गर्व है और उनकी सेवा और बलिदान को कभी भुलाया नहीं जाएगा।” संसद की विदेश मामलों की कमेटी की चेयरपर्सन एमिली थॉर्नबेरी ने कहा, “यह सरासर बेइज्जती है। यह उन 457 परिवारों की बेइज्जती है जिन्होंने अफगानिस्तान में किसी अपने को खोया है। उसकी हिम्मत कैसे हुई यह कहने की कि हम फ्रंट लाइन पर नहीं थे?”