“मरीजों को अधिक पैसे वसूलने वाले अस्पतालों के खिलाफ सख्ती बरतेगी सरकार, सुप्रीम कोर्ट को दी कार्रवाई की गारंटी”…

यह किसी से छिपा नहीं है कि देश के अस्पतालों में जाने के बाद मरीज से पैसे एंठे जाते हैं चाहे वो टेस्ट के नाम पर हो या ऑपरेशन और दवा के नाम पर। वहीं, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है कि अस्पताल मरीजों से दवाओं और उपभोग्य सामग्रियों पर ज्यादा एमआरपी वसूलने की कुप्रथा अपनाते हैं।

रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने शपथपत्र में कहा कि सरकार इस समस्या से अवगत है, इसकी जांच कर रही है और सभी हितधारकों से सलाह-मशविरा कर उचित कदम उठा रही है।

सभी दवाओं और चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों की कीमतों पर कैप लगाने के मुद्दे पर दायर शपथपत्र में सरकार ने कहा कि मरीजों की अस्पतालों के मुकाबले सौदेबाजी की स्थिति बहुत कमजोर होती है, जिसके चलते कई तरह की कुप्रथाएं पनपती हैं। भारत में सस्ती दवाएं बनाने वाली कंपनियां हैं, लेकिन यहां मरीजों को विनिर्माण कीमत से कहीं ज्यादा चुकाना पड़ता है।

शपथपत्र में कहा गया कि भारतीय दवा बाजार काफी प्रतिस्पर्धी है और हर खंड में बड़ी संख्या में कंपनियां हैं, जिससे दुनिया में सबसे कम कीमतें मिलती हैं। सामान्यतः जहां प्रतिस्पर्धा हो, वहां कीमत नियंत्रण की जरूरत नहीं होती। लेकिन स्वास्थ्य उपचार और दवाओं में मरीजों तथा फार्मेसियों, अस्पतालों व डॉक्टरों के बीच जानकारी और सौदेबाजी की असमानता है।

कैंसर दवाओं पर 700% तक मार्जिन

सरकार ने बताया कि अस्पताल उन निर्माताओं से दवाएं खरीदते हैं जो सबसे ज्यादा ट्रेड मार्जिन देते हैं और फिर मरीजों को एमआरपी पर बेचते हैं।

एंटी-कैंसर दवाओं में मार्जिन 170% से 700% या उससे ज्यादा तक होता है। उपभोग्य सामग्रियों में भी 100% से 1000% या अधिक मार्जिन आम है। अस्पताल उच्च एमआरपी और मार्जिन वाली सामग्रियां खरीदना पसंद करते हैं।

सरकार ने बताया कि उसने 935 अनुसूचित फॉर्मूलेशन की अधिकतम कीमतें और 3,881 नई दवाओं की खुदरा कीमतें तय की हैं। यह शपथपत्र डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की याचिका पर दायर किया गया, जिसमें निति आयोग की रिपोर्ट और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के 2020 के बयान का जिक्र था कि स्वास्थ्य खर्च के कारण हर साल करीब छह करोड़ परिवार गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।

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