प्रियंका प्रसाद (ज्योतिष सलाहकार): केवल व्हाट्सएप मेसेज 94064 20131
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को ‘गोपाष्टमी’ के रूप में मनाया जाता है।
इस बार यह 30 अक्तूबर को है। इस दिन भगवान वासुदेव ने गोचारण की सेवा प्रारंभ की थी। इसके पूर्व वे केवल बछड़ों की देखभाल करते थे। कथा है कि बालक कृष्ण पहले केवल बछड़ों को चराने जाते थे और उन्हें अधिक दूर जाने की भी अनुमति नहीं थी।
एक दिन कृष्ण ने मां यशोदा से गायों की सेवा करने की इच्छा व्यक्त की और कहा कि मां मुझे गाय चराने की अनुमति चाहिए। उनके अनुग्रह पर नंद बाबा और यशोदा मैया ने शांडिल्य ऋषि से अच्छा समय देखकर मुहूर्त निकालने के लिए कहा। ऋषि ने गाय चराने ले जाने के लिए जो समय निकाला, वह गोपाष्टमी का शुभ दिन था।
यशोदा मैया ने कृष्ण को अच्छे से तैयार किया। उन्हें बड़े गोप-सखाओं जैसे वस्त्र पहनाए। सिर पर मोर-मुकुट, पैरों में पैजनिया पहनाई, परंतु जब मैया उन्हें सुंदर-सी पादुका पहनाने लगीं, तो वे बोले यदि वे सभी गौओं और गोप-सखाओं को भी पादुकाएं पहनाएंगी, तभी वे भी पहनेंगे।
कान्हा के इस प्रेमपूर्ण व्यवहार से मैया का हृदय भर आया और वे भाव-विभोर हो गईं। इसके पश्चात कृष्ण ने गायों की पूजा तथा प्रदक्षिणा करते हुए साष्टांग प्रणाम किया और बिना पादुका पहने गोचारण के लिए निकल पड़े।
ब्रज में किंवदंती यह भी है कि राधारानी भी भगवान के साथ गोचारण के लिए जाना चाहती थीं, परंतु स्त्रियों को इसकी अनुमति नहीं थी, इसलिए वे और उनकी सखियां गोप-सखाओं का भेष धारण करके उनके समूह में जा मिलीं, परंतु भगवान ने राधारानी को तुरंत पहचान लिया।
इसी लीला के कारण आज के दिन ब्रज के सभी मंदिरों में राधारानी का गोप-सखा के रूप में शृंगार किया जाता है।
गोपाष्टमी के अवसर पर गौशाला में गोसंवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन किया जाता है। गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं।
महिलाएं श्रीकृष्ण की पूजा कर गऊओं को तिलक लगाती हैं। गायों को हरा चारा, गुड़ इत्यादि खिलाया जाता है तथा सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। गोपाष्टमी, ब्रज में भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है। गाय की रक्षा और गोचारण करने के कारण भगवान कृष्ण को ‘गोविंद’ और ‘गोपाल’ नाम से भी संबोधित किया जाता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण ने कार्तिक शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक ‘गो-गोप-गोपियों’ की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था।
तभी से अष्टमी को ‘गोपाष्टमी’ के तौर पर मनाया जाने लगा। अष्टमी के दिन ही कृष्ण ने इंद्र का मान-मर्दन किया था और इंद्र ने अपने व्यवहार के लिए कृष्ण से क्षमा मांगी।