महाशक्तियों के मंच पर चीन नहीं, G7 की रणनीति पर वैश्विक बहस तेज…

फ्रांस में एक बार फिर दुनिया के सबसे अमीर देशों के समूह यानी जी-7 (G7) का शिखर सम्मेलन शुरू हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत दुनिया के कई बड़े नेता इस बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे हैं। लेकिन इस बार भी इस महामंच पर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यानी चीन मौजूद नहीं है। ऐसे में वैश्विक मामलों के जानकारों का मानना है कि आज के दौर में चीन को इस बैठक से बाहर रखना एक बड़ी भूल साबित हो सकता है। आइए यहां समझते हैं क्यों?

शुरुआत में चीन क्यों नहीं था शामिल?

शुरुआत से बात करें तो जब साल 1975 में पहली बार फ्रांस के एक महल में दुनिया की बड़ी ताकतें आर्थिक मंदी से निपटने के लिए जुटी थीं, तब चीन इसका हिस्सा नहीं था। इसके दो मुख्य कारण थे। पहला यह था कि उस समय चीन के क्रांतिकारी नेता माओ त्से तुंग का दौर था और चीन आंतरिक उथल-पुथल से जूझ रहा था। तब चीन आर्थिक रूप से बेहद कमजोर था।

दूसरा माओ ने वियतनाम युद्ध में वहां के कम्युनिस्टों की मदद की थी, जिससे फ्रांस और अमेरिका की सेनाओं को हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में अमेरिका या फ्रांस के नेताओं के साथ चीन का बैठना मुमकिन ही नहीं था। बता दें कि इस ग्रुप में पहले 6 देश थे, जो अगले साल कनाडा के जुड़ने के बाद जी-7 (अमेरिका, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और कनाडा) बन गया।

चीन के बिना जी-7 की बैठक अब ‘गलती’ क्यों लगती है?

गौर करने वाली बात यह है कि आज का चीन 1975 जैसा नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि तब चीन ‘एक छोटा और सीधा पांडा’ जैसा था, लेकिन आज वह एक ‘ग्लोबल ड्रैगन’ बन चुका है। चीन के बिना इस बैठक का महत्व कम होने के कई बड़े कारण हैं। प्रमुख तौर पर चीन की विशाल अर्थव्यवस्था है।

ऐसे में अगर अमीर देशों का क्लब सिर्फ आर्थिक सफलता पर तय हो, तो चीन को बहुत पहले ही इसमें शामिल हो जाना चाहिए था। कारण है कि चीन की अर्थव्यवस्था आज जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और कनाडा से बहुत बड़ी हो चुकी है। सिर्फ अमेरिका ही उससे आगे है।

दुनिया पर प्रभाव और क्लाइमेट चेंज में प्रभावी देश 

दूसरा मौसम में बदलाव (क्लाइमेट चेंज) फैलाने वाले प्रदूषण में चीन दुनिया में सबसे आगे है। साथ ही उसकी सैन्य ताकत और तकनीक दुनिया को हैरान कर रही है। ऐसे में वैश्विक समस्याओं का हल चीन के बिना नहीं निकाला जा सकता। खुद राष्ट्रपति ट्रंप भी एक बार कह चुके हैं कि जी-7 में चीन को शामिल करना बुरा विचार नहीं है।

फिर भी चीन को क्यों नहीं किया जा रहा शामिल?

बता दें कि चीन को इस ग्रुप से बाहर रखने के पीछे कुछ बहुत बड़े कूटनीतिक कारण हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण है कि लोकतंत्र का कड़ा नियम और चीन की तानाशाही। इस बात को ऐसे समझिए कि जी-7 देशों का एक अनकहा लेकिन बेहद पक्का नियम है कि इस समूह में केवल वही देश शामिल हो सकते हैं जहां पूरी तरह से लोकतंत्र है और नियमित चुनाव होते हैं। इसके विपरीत, चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की एकतरफा तानाशाही सरकार है, जो इस मंच के मूल सिद्धांतों से मेल नहीं खाती। 

रूस और  ईरान के मुद्दों पर गहरा मतभेद

दूसरा कारण है कि ग्लोबल पॉलिटिक्स में चीन का रुख जी-7 देशों की सोच से बिल्कुल अलग है। जहां एक तरफ जी-7 देश रूस और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने के पक्ष में रहते हैं, वहीं चीन इन दोनों ही देशों का खुलकर समर्थन करता है। विचारों का यह बड़ा टकराव भी चीन को इस ग्रुप से दूर रखता है।

ग्रुप टूटने का डर और ‘ट्रोजन हॉर्स’ बनने का खतरा

तीसरा कारण है कि टोरंटो यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ जॉन किर्टन का मानना है कि चीन को शामिल करना जी-7 के लिए ‘ट्रोजन हॉर्स’ (यानी अंदरूनी खतरा) साबित हो सकता है। जानकारों को डर है कि चीन के आते ही इस समूह की एकजुटता खत्म हो जाएगी, क्योंकि कई छोटे सदस्य देश चीन से सस्ते खनिज और आर्थिक फायदे लेने के चक्कर में जी-7 के मुख्य एजेंडे से पीछे हट सकते हैं।

रूस से मिला सबक, अन्य देश सतर्क हुए कैसे?

चौथा और सबसे अहम कारण है कि साल 1998 में इस ग्रुप को बढ़ाकर रूस को शामिल किया गया था (तब यह G8 बना था)। लेकिन 2014 में जब पुतिन ने यूक्रेन से क्रीमिया को छीन लिया, तो रूस को ग्रुप से बाहर निकाल दिया गया। इस कड़वे अनुभव के बाद जी-7 देशों ने कसम खा ली है कि वे किसी भी ऐसे देश को शामिल नहीं करेंगे जहां पूरी तरह लोकतंत्र न हो।

अब चीन का क्या कहना है?

गौरतलब है कि इस पूरे मामले में चीन की कम्युनिस्ट सरकार पहले जी-7 को शीत युद्ध की पुरानी याद बताती थी। लेकिन इस बार चीन के विदेश मंत्रालय ने थोड़ा नरम रुख अपनाते हुए कहा है कि कि जी-7 को दुनिया में दरार और टकराव बढ़ाने के बजाय एकजुटता और सहयोग बढ़ाने का काम करना चाहिए।

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