पश्चिम एशिया में आज जब शांति की कोशिशें हो रही हैं, तब भी अतीत की खून सनी परछाइयां बातचीत की मेज पर मंडरा रही हैं।
इस पूरे संघर्ष को समझने के लिए एक नाम को समझना जरूरी है इमाद मुगनिया। वह न तो टीवी पर दिखता था, न भाषण देता था, लेकिन दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों के लिए वह सबसे बड़ा सिरदर्द बना रहा।
1962 में लेबनान में जन्मा यह शख्स गृहयुद्ध और बाहरी दखल के दौर में बड़ा हुआ। शुरुआती दिनों में उसने यासीर अराफात के साथ काम किया, लेकिन जल्द ही उसका रास्ता अलग हो गया और 1980 के दशक में वह हिजबुल्लाह के गठन में अहम किरदार बन गया।
कौन था मुगनिया?
कहा जाता है कि 9/11 से पहले जितनी अमेरिकी मौतों के पीछे किसी एक व्यक्ति का नाम लिया जाता था, वह मुगनिया ही था। वह हमलों की योजना बनाता, नेटवर्क खड़ा करता और फिर गायब हो जाता। यही वजह थी कि वाशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक की एजेंसियां उसे भूत की तरह ढूंढती रहीं।
लेकिन हर बार वह उनकी पकड़ से बाहर निकल जाता।बार-बार हाथ से फिसला शिकार, जब मौके आए, लेकिन फैसले चूक गए मुगनिया को पकड़ने या खत्म करने के मौके कई बार आए, लेकिन हर बार राजनीति, कूटनीति या अधूरी जानकारी आड़े आ गई।
एक बार फ्रांस में उसे हिरासत में लेने का मौका था, लेकिन कथित तौर पर एक बंधक की रिहाई के बदले उसे जाने दिया गया। यह सिर्फ एक चूक नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि वह बड़े-बड़े देशों को भी अपने हिसाब से खेलने पर मजबूर कर सकता है। 1995 में खबर मिली कि वह जेद्दा होते हुए गुजरने वाला है।
कैसे भाग निकला?
अमेरिका ने सऊदी अरब से उसे पकड़ने को कहा, लेकिन अनुमति नहीं मिली और वह फिर निकल गया। अगले ही साल खुफिया जानकारी आई कि वह एक जहाज पर है, अमेरिकी नौसेना तैयार थी, कमांडो आपरेशन भी लगभग तय था, लेकिन आखिरी वक्त पर मिशन रोक दिया गया क्योंकि जानकारी पूरी तरह पक्की नहीं थी।
इस बीच वह सिर्फ बच नहीं रहा था, बल्कि अपनी ताकत बढ़ा रहा था। 1992 में अर्जेंटीना में इजरायली दूतावास पर हमला, 1994 में एएमआइए सेंटर विस्फोट ऐसे कई हमलों के तार उससे जोड़े गए। उसने एशिया से लेकर मध्य पूर्व तक अपना नेटवर्क फैलाया और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर की मदद से अपनी पहुंच और मजबूत की।
एक सटीक हमला जिसने सब खत्म कर दिया2000 के दशक तक मुगनिया दुनिया के सबसे वांछित लोगों में शामिल हो चुका था। वह सीरिया की राजधानी दमिश्क में बशर अल-असद के संरक्षण में रह रहा था। उसने अपनी पहचान छिपाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी तक करवाई, सार्वजनिक रूप से शायद ही कभी दिखता था।
पीछे पड़ी थी CIA और मोसाद
लेकिन अमेरिका की सीआइए और इजरायल की मोसाद उसकी हर गतिविधि पर नजर रखे हुए थीं। एक वक्त ऐसा भी आया जब वह कासिम सुलेमानी के साथ देखा गया। दोनों को एक साथ खत्म करने का मौका था, लेकिन खतरा इतना बड़ा था कि आपरेशन रोक दिया गया।
यह वही संयम था, जो खुफिया दुनिया में बहुत कम देखने को मिलता है। फिर आया वह दिन, जिसका इंतजार 20 साल से था। फरवरी 2008, दमिश्क का काफर सूसा इलाका। जैसे ही मुगनिया अपनी कार के पास पहुंचा, एक कार में छिपाया गया रिमोट कंट्रोल बम फटा और उसी पल उसका अंत हो गया।
यह ऑपरेशन इतना सटीक था कि कोई आम नागरिक इसकी चपेट में नहीं आया। खुफिया भाषा में इसे क्लीन आपरेशन कहा गया।एक शख्स जिसने जंग का तरीका बदल दियामुगनिया की मौत के बाद अमेरिका, इजरायल और कई देशों ने राहत की सांस ली, लेकिन उसका असर खत्म नहीं हुआ।
इजरायल का भूमिका
उसने जो तरीके दुनिया को दिए आत्मघाती हमले, बंधक बनाना, वैश्विक नेटवर्क वे आज भी कई संगठनों की रणनीति का हिस्सा हैं। सालों तक इजरायल ने इस आपरेशन में अपनी भूमिका से इनकार किया, लेकिन 2024 में एहुद ओल्मर्ट ने इसे स्वीकार किया।
तब तक बहुत कुछ बदल चुका था। उसका बेटा भी बाद में एक हमले में मारा गया, लेकिन हिज्बुल्लाह खत्म नहीं हुआ उसने खुद को बदला और फिर से खड़ा हो गया। यही इस कहानी की सबसे बड़ी सच्चाई है एक आदमी को खत्म करने में 20 साल लग सकते हैं, लेकिन उसके बनाए हुए नेटवर्क और सोच को खत्म करना कहीं ज्यादा मुश्किल होता है।