महाशक्तिशाली मोदी: 2030 के बाद भी सत्ता की राह आसान, विपक्ष बिखरा हुआ दिखा…

दो साल पहले 2024 की भीषण गर्मियों में हुए आम चुनावों ने जब मोदी युग के कमजोर होने के संकेत दिए थे, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इतनी जल्दी और इतनी मजबूती से वापसी करेंगे।

ब्लूमबर्ग के एक हालिया विश्लेषण के अनुसार, बंगाल की ऐतिहासिक जीत और दक्षिण भारत के चुनावी समीकरणों ने यह साफ कर दिया है कि मोदी न केवल 2029 के लिए भारी बहुमत की ओर बढ़ रहे हैं, बल्कि 2030 के दशक के उत्तरा‌र्द्ध तक सत्ता के शीर्ष पर बने रहने की तैयारी कर चुके हैं।

केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रणनीति

चुनावी चक्रव्यूह व हिंदुत्व का नया प्रयोग 75 वर्षीय मोदी की रणनीति अब केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है।

बंगाल में ममता बनर्जी के 15 साल के किले को ढहाकर और तमिलनाडु एवं केरल जैसे राज्यों में पैठ बनाकर भाजपा ने विपक्ष को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है। विश्लेषण बताता है कि मोदी ने ‘हिंदू वोटों’ के एकीकरण का जो फॉर्मूला 2014 में शुरू किया था, वह अब और अधिक धारदार हो गया है।

धार्मिक पहचान, राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रभावी जनकल्याणकारी योजनाओं के त्रिकोण ने जातिगत राजनीति को पीछे छोड़ दिया है। राजनीतिक विश्लेषक माइकल कुगेलमैन के अनुसार, ‘भाजपा अब चौथी बार सत्ता में आने के लिए सबसे प्रबल दावेदार है।’

2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य

बंगाल में भाजपा का तीन सीटों से बढ़कर 207 सीटों तक पहुंचना यह दर्शाता है कि ध्रुवीकरण और सांगठनिक कौशल ने विपक्ष के पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा है।

आर्थिक सुधार और भविष्य की चुनौतियां ईरान युद्ध के कारण बढ़ती तेल की कीमतों और मुद्रास्फीति के बावजूद, मोदी का राजनीतिक रसूख उन्हें कड़े आर्थिक फैसले लेने की शक्ति दे रहा है।

उन्होंने देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के साथ एपल जैसी दिग्गज कंपनियों को आकर्षित करने और श्रम कानूनों को सरल बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

वैचारिक एजेंडे की ओर बढ़ते कदम इस प्रचंड जीत ने मोदी को उनके मूल वैचारिक एजेंडे – जैसे ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ और ‘समान नागरिक संहिता’ – को लागू करने का नया नैतिक बल दिया है।

हालांकि राज्यसभा में संख्याबल और अल्पसंख्यकों के विरोध जैसी चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं, लेकिन विपक्ष की बिखरी हुई स्थिति मोदी की राह आसान कर रही है।

पूर्व सांसद कपिल सिब्बल और हन्नान मुल्ला जैसे विपक्षी नेताओं की चिंताएं भी इसी ओर इशारा करती हैं कि फिलहाल भाजपा को चुनौती देने वाला कोई नेतृत्व सामने नहीं है। यदि आंतरिक गुटबाजी आड़े नहीं आई, तो मोदी का यह विजय रथ 2030 के दशक के अंत तक रुकता नजर नहीं आता।

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