अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अमेरिकी नौसेना के जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों को एस्कार्ट करने का आदेश देने पर विचार कर रहे हैं।
नौसेना विश्लेषकों और इतिहासकारों को ऐसा लग रहा है जैसे वे पहले भी ऐसी स्थिति देख चुके हैं।
लगभग 40 साल पहले अमेरिकी युद्धपोतों का सामना, उसी दुश्मन से हुआ था, जिसका सामना वे अब कर रहे हैं।
वह थी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर की नौसेना। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, टैंकर युद्ध की नींव 1980 में पड़ी, जब इराक के पंथनिरपेक्ष नेता सद्दाम हुसैन ने अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी के नेतृत्व वाली ईरान की धार्मिक सरकार से सावधान होकर अपने पूर्वी पड़ोसी देश पर आक्रमण कर दिया।
1984 तक स्थिति गंभीर हो गई और निरंतर युद्ध जैसे हालात हो गए। तभी सद्दाम हुसैन ने रणनीति बदलने का फैसला किया और ईरानी तेल टैंकरों पर हमला किया, ताकि तेहरान की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया जा सके। उनको लग रहा था कि इससे वैश्विक शक्तियां तेल तक पहुंच की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करेंगी।
इराक ने मिसाइलों से लैस विमानों का इस्तेमाल करते हुए खार्ग द्वीप पर ईरानी तेल संयंत्र को निशाना बनाया (वही जगह जहां हाल के दिनों में अमेरिका ने बमबारी की थी)।
ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इराक को आपूर्ति और हथियार ले जा रहे तटस्थ व्यापारिक जहाजों पर हमला किया, जिनमें से अधिकांश फारस की खाड़ी के उत्तरी छोर पर स्थित कुवैत के रास्ते जा रहे थे।
इतिहासकार सैमुअल काक्स ने एक लेख में कहा कि इसके बाद इराक ने खार्ग द्वीप से आने-जाने वाले टैंकरों पर हमला करना शुरू कर दिया और ‘टैंकर युद्ध’ शुरू हो गया। नवंबर 1986 में कुवैत अपने जहाजों पर हो रहे हमलों से तंग आकर उनकी सुरक्षा के लिए विदेशी सहायता मांगने लगा।
सोवियत संघ ने की थी सहायता
तत्कालीन सोवियत संघ ने सबसे पहले सहायता प्रदान की और खाड़ी क्षेत्र से टैंकरों को सुरक्षित निकाला। वा¨शगटन, मास्को के सामने अपना प्रभाव खोना नहीं चाहता था।
इसलिए उसने कुवैती जहाजों का अमेरिकी ध्वज के तहत रजिस्ट्रेशन करने की योजना बनाई, जिससे उन्हें संघीय कानून के तहत अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा प्राप्त हो सके।
1987 की गर्मियों तक अमेरिकी जहाज कुवैती टैंकरों को सुरक्षा देने के लिए बड़ी संख्या में खाड़ी में तैनात हो चुके थे। लेकिन सुरक्षा अभियान शुरू होने से पहले ही अमेरिकी नौसैनिकों को खतरे का सामना करना पड़ा।
17 मई, 1987 की शाम को यूएसएस स्टार्क मध्य फारस की खाड़ी में गश्त पर था, जब एक इराकी युद्धक विमान ने अमेरिकी युद्धपोत को ईरानी लक्ष्य समझकर उस पर दो मिसाइलें दाग दीं।
इससे युद्धपोत पर सवार लगभग 220 चालक दल सदस्यों में से 29 की मौके पर ही मौत हो गई। आठ अन्य की घावों और जलने से मृत्यु हो गई, जबकि 21 अन्य घायल हो गए।
अमेरिकी नौसेना द्वारा आपरेशन अर्नेस्ट विल नाम से शुरू किए गए इस अभियान के तहत टैंकरों की वास्तविक सुरक्षा जुलाई 1987 के अंत में शुरू हुई।
22 जुलाई, 1987 को दो टैंकर संयुक्त अरब अमीरात से कुवैत के लिए रवाना हुए, जिन्हें पांच अमेरिकी जहाजों की सुरक्षा प्राप्त थी। लेकिन, ईरान के पास काफिले की अच्छी खुफिया जानकारी थी।
उसने खाड़ी के एक महत्वपूर्ण चैनल में बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं, जिससे विशाल टैंकर ब्रिजेटन को गुजरना था। 24 जुलाई को ब्रिजेटन एक बारूदी सुरंग से टकरा गया। हालांकि, टैंकर पर कोई खास असर नहीं पड़ा।
यह घटना अमेरिकी नौसेना के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी का कारण बनी। इसके बाद पेंटागन को बारूदी सुरंग हटाने वाले जहाजों के लिए सहयोगियों की मदद लेनी पड़ी। ईरान द्वारा खाड़ी में बिछाई गई वर्तमान बारूदी सुरंगों की सीमा अभी तक अज्ञात है।
अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि तेहरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में कुछ बारूदी सुरंगें बिछाई हैं, लेकिन अभी तक जहाजों को नुकसान पहुंचने की कोई रिपोर्ट नहीं मिली है।