मानसून के दौरान अल नीनो हुआ मजबूत, मौसम विशेषज्ञों ने वर्षा को लेकर जताई आशंका…

भूमध्य रेखा के समीप प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति विकसित हो चुकी है और दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान इसके और अधिक प्रभावी होने की संभावना है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आइएमडी) ने शुक्रवार को बताया कि समुद्र की सतह के तापमान में बढ़ोतरी के साथ वायुमंडलीय गतिविधियों में भी बदलाव देखने को मिला है, जिससे महासागर और वायुमंडल की संयुक्त प्रणाली अब अल नीनो के अनुरूप संकेत दे रही है।

आईएमडी ने कहा कि मानसून के महीनों में अल नीनो की तीव्रता बढ़ सकती है। इससे पहले वर्ष 2023 में भी अल नीनो की स्थिति बनी थी। इसके अलावा 2002, 2009 और 2015 में भी ऐसे हालात देखे गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि एल नीनो का प्रभाव भारतीय मानसून पर पड़ता है और इसके कारण सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका बढ़ जाती है।

एल नीनो एक जलवायु घटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह ‘अल नीनो दक्षिणी दोलन’ (ईएनएसओ) चक्र का एक चरण है। इसके विपरीत चरण को ‘ला नीना’ कहा जाता है, जो आमतौर पर वैश्विक तापमान को कम करने में सहायक होता है।

ईएनएसओ का एक तटस्थ चरण भी होता है। आईएमडी ने 29 मई को जारी अपने पूर्वानुमान में कहा था कि इस वर्ष मानसून के दौरान देश में वर्षा दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का लगभग 90 प्रतिशत रहने की संभावना है।

भारत में 1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर मौसमी वर्षा का एलपीए 87 सेंटीमीटर है। देश में सालाना वर्षा का अधिकांश हिस्सा मानसून से प्राप्त होता है, जो कृषि, पेयजल, जलविद्युत उत्पादन और भूजल पुनर्भरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस वर्ष मानसून ने केरल में चार जून को दस्तक दी, जबकि सामान्य तिथि एक जून मानी जाती है।

आईएमडी ने कहा कि अगले दो-तीन दिनों में मानसून के मध्य अरब सागर, महाराष्ट्र, कर्नाटक के बाकी हिस्सों, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और बंगाल के कुछ और इलाकों में आगे बढ़ने के लिए हालात अनुकूल हैं। मौसम विभाग ने यह भी कहा कि इस दौरान ओडिशा, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ और हिस्सों में भी मानसून आगे बढ़ेगा।

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