दो दशकों बाद इराक से अमेरिकी सेना की विदाई, ईरान के लिए क्यों अहम माना जा रहा यह घटनाक्रम?…

इराक में पिछले दो दशकों से चला आ रहा अमेरिकी सैन्य दखल अब आधिकारिक तौर पर समाप्त होने जा रहा है। अमेरिकी सेना बुधवार तक इराक में अपने आखिरी बचे सैन्य अड्डों को भी पूरी तरह से खाली कर रही है। इसके साथ ही 2003 के अमेरिकी आक्रमण से शुरू हुआ सैन्य मौजूदगी का यह लंबा अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है।

ईरान और उसके समर्थकों ने इसे एक बड़ी जीत के रूप में देखा है, जबकि सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस खालीपन से ईरान का प्रभाव और इस्लामिक स्टेट (ISIS) के फिर से सिर उठाने का खतरा बढ़ सकता है।

अब समझिए क्या है पूरा मामला?

बता दें कि यह ऐतिहासिक फैसला साल 2024 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल के दौरान तय हुआ था, जिसे अब डोनल्ड ट्रंप की प्रशासन द्वारा अमली जामा पहनाया जा रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि इस दो दशक लंबे संघर्ष में करीब 4500 अमेरिकी सैनिकों ने अपनी जान गंवाई।

अमेरिका का 2003 का वो आक्रमण

इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि अमेरिका ने 2003 में सद्दामा हुसैन को सत्ता से बेदखल करने के लिए इराक पर आक्रमण किया था और वहां एक शिया-नेतृत्व वाली सरकार स्थापित की थी। 2011 के अंत में अमेरिकी सेना यहां से हटी थी, लेकिन इस्लामिक स्टेट (ISIS) के बढ़ते खतरे के कारण 2014 से 2017 के बीच उन्हें दोबारा इराक लौटना पड़ा था।

अफगानिस्तान से भी बड़ा नुकसान

इसके अलावा सबसे अहम बात यह है कि इराक युद्ध (ऑपरेशन इराकी फ्रीडम) के दौरान अमेरिका को अफगानिस्तान की तुलना में लगभग दोगुना ज्यादा सैनिक मारे गए थे।

ये ईरान के लिए जीत कैसे है?

इस बात को ऐसे समझिए कि इराक से अमेरिकी सैनिकों के जाने पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। ईरान समर्थित ‘इस्लामी रेजिस्टेंस इन इराक’ के कमांडर अबू मुज्तबा अल-यासिरी ने इसे इराकी प्रतिरोध समूहों की ऐतिहासिक जीत और अमेरिकी प्रोजेक्ट की करारी हार बताया है। वजह है कि ईरान लंबे समय से पश्चिम एशिया से अमेरिकी सेना को बाहर देखना चाहता था।

दूसरी ओर, सुरक्षा विश्लेषक जासिम अल-बहादली का कहना है कि अमेरिकी सैनिकों के हटने से तेहरान के खिलाफ जो एक संतुलन बना हुआ था, वह खत्म हो जाएगा। इससे ईरान समर्थित मिलिशिया का राजनीतिक और सुरक्षा मामलों में प्रभाव और अधिक बढ़ जाएगा।

संतुलन बनाने के चक्कर में कैसे फंसा इराक?

गौरतलब है कि इराक ने पिछले दो दशकों में वाशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ संबंध बनाए रखे, हालांकि इसका परिणाम यह हुआ कि इराक कई बार दोनों देशों के बीच प्रॉक्सी युद्ध का अखाड़ा बन गया।

साल 2020 में बगदाद एयरपोर्ट पर अमेरिकी हमले में ईरानी कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत हो गई थी, जबकि ईरान समर्थित समूहों ने कई बार अमेरिकी ठ्डों को निशाना बनाया था। अब अमेरिकी सेना की पूर्ण वापसी के बाद मध्य-पूर्व की भू-राजनीति में एक नया मोड़ आने की पूरी उम्मीद है।

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