वर्षों से सरकारी गलियारों में ‘मनहूस’ माने जाने वाले सिविल लाइंस स्थित 33 शमनाथ मार्ग का प्रसिद्ध आवासीय बंगला अब नई पहचान पाने जा रहा है।पीडब्ल्यूडी ने इसके लिए कंसल्टेंट नियुक्त करने का टेंडर जारी कर दिया है।
नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा आवास के रूप में लेने में रुचि न दिखाने के बाद लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) इस ऐतिहासिक भवन को अत्याधुनिक इंटीग्रेटेड कंट्रोल एंड कमांड सेंटर (आईसीसीसी) में विकसित करने की तैयारी कर रहा है।
दो महीने में देना होगा डीपीआर
चयनित एजेंसी को कार्य आवंटन के दो महीने के अंदर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करनी होगी। रिपोर्ट में परियोजना की अनुमानित लागत, संचालन एवं रखरखाव व्यय, आवश्यक मानव संसाधन, तकनीकी ढांचा और अन्य व्यवस्थाओं का पूरा आकलन किया जाएगा। डीपीआर तैयार करने पर लगभग 17 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है।
मुख्यमंत्री की घोषणा
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने वर्ष 2026-27 के बजट में इस इंटीग्रेटेड कंट्रोल एंड कमांड सेंटर की घोषणा की थी। प्रस्तावित केंद्र प्राकृतिक आपदा, आग, बाढ़, भवन दुर्घटना तथा अन्य आपात स्थितियों के दौरान विभिन्न सरकारी विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करेगा। इस केंद्र के माध्यम से रियल-टाइम निगरानी, त्वरित सूचना साझा करने और तेज निर्णय लेने की सुविधा मिल सकेगी, जिससे दिल्ली की आपदा प्रबंधन व्यवस्था और अधिक प्रभावी बनेगी।
बंगले का ऐतिहासिक महत्व
करीब 100 वर्ष पुराने इस बंगले का अपना एक चर्चित इतिहास रहा है। 1920 के दशक में ब्रिटिश काल में इसे वरिष्ठ अधिकारियों के आवास के रूप में बनाया गया था। स्वतंत्रता के बाद दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश यहां रहे, लेकिन कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बाद में पूर्व मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना को यह बंगला आवंटित हुआ, हालांकि उन्होंने यहां केवल कार्यालय चलाया।
क्यों कहा जाता है मनहूस बंगला?
सिविल लाइंस स्थित 33 शमनाथ मार्ग का ऐतिहासिक बंगला दशकों से ‘मनहूस’ की छवि के लिए कुख्यात रहा है। इस बंगले में रहने वाले कई मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों का कार्यकाल अधूरा रहा या उन्हें दुर्भाग्य का सामना करना पड़ा।
वर्ष 1952 में दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश यहां रहे, लेकिन उनका कार्यकाल जल्दी समाप्त हो गया।
इसके बाद मदन लाल खुराना (1993), मंत्री दीपचंद बंधु (2003) और नौकरशाह शक्ति सिन्हा (2013) जैसे लोग भी यहां टिक नहीं सके। दीपचंद बंधु का तो यहां रहने के कुछ दिनों बाद निधन हो गया था।
लंबे समय तक खाली पड़े इस बंगले को अब नई पहचान मिलने की संभावना है। करीब 5500 वर्गमीटर में फैले इस भव्य बंगले की ‘मनहूस’ वाली कहानी अब शायद एक नए अध्याय की ओर बढ़ रही है।