वर्षा वर्मा – समाज सेविका (लखनऊ- उत्तरप्रदेश)
मानवता को झकझोर देने वाली एक मार्मिक घटना ने एक बार फिर समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक नवजात बच्ची, जिसका न कोई नाम था, न कोई पहचान और न ही उसे अपनाने वाला कोई अपना। वह कचरे के ढेर के बीच लावारिस अवस्था में मिली। जिस मासूम को इस दुनिया में आने से पहले ही ठुकरा दिया गया, उसे जीवन का अधिकार तो नहीं मिल सका, लेकिन उसकी अंतिम विदाई पूरे सम्मान, संवेदना और मानवीय गरिमा के साथ दी गई।
माँ की ममता बनकर निभाया अंतिम फर्ज
सफेद कपड़े में लिपटी वह नन्ही सी देह किसी के लिए सिर्फ एक लावारिस शव रही होगी, लेकिन मानव सेवा के लिए समर्पित लोगों ने उसे अपनी बेटी मानकर अंतिम संस्कार किया। पूरे धार्मिक विधि-विधान और सम्मान के साथ उसकी अंतिम यात्रा संपन्न कराई गई।
जिसने भी उस मासूम को अंतिम बार अपनी गोद में उठाया, उसकी आंखें नम थीं। कंधों पर जिम्मेदारी थी, लेकिन हृदय में एक माँ जैसा वात्सल्य और दर्द उमड़ रहा था। यह केवल एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि मानवता के प्रति कर्तव्य और संवेदनशीलता का अद्भुत उदाहरण था।
समाज से पूछते कुछ असहज सवाल
यह घटना कई ऐसे प्रश्न छोड़ जाती है जिनका उत्तर पूरे समाज को तलाशना होगा।
क्या एक बेटी का जन्म आज भी कुछ लोगों के लिए अभिशाप माना जाता है?
क्या बेटियों को जन्म लेने का अधिकार नहीं है?
क्या हम केवल “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा देने तक ही सीमित रह गए हैं?
जिस बच्ची को जीने का अवसर नहीं मिला, उसे कम से कम मृत्यु के बाद वह सम्मान मिला जिसकी हर इंसान हकदार होता है। लेकिन यह सम्मान उस जीवन की भरपाई नहीं कर सकता, जो उसे कभी मिला ही नहीं।
यह सिर्फ अंतिम संस्कार नहीं, समाज के नाम एक संदेश है
यह घटना हर उस परिवार के लिए एक आईना है जो आज भी बेटी और बेटे में भेदभाव करता है। यह हर उस व्यक्ति के लिए संदेश है जो ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साध लेता है।
बेटियों को बचाना केवल सरकारी अभियान नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक प्रत्येक बेटी को जन्म लेने, जीने और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक हमारी संवेदनाएं अधूरी रहेंगी।
आज उस मासूम का नाम किसी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होगा, लेकिन मानवता के इतिहास में वह हमेशा उस बेटी के रूप में याद की जाएगी, जिसे अपनों ने भले ही ठुकरा दिया, लेकिन इंसानियत ने उसे अपनी बेटी मानकर अंतिम विदाई दी।
“तुम्हें दुनिया ने शायद अपना नहीं माना, नन्ही परी…
लेकिन तुम्हारी अंतिम यात्रा में इंसानियत तुम्हारे साथ थी।
ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति प्रदान करे।”
वर्षा वर्मा की ज़ुबानी
“बेटी, तुम्हारा कोई नहीं था… पर इंसानियत तुम्हारे साथ थी”
उसकी कोई गोद नहीं थी।
कोई लोरी नहीं थी।
कोई नाम नहीं था।
सिर्फ सन्नाटा था… और कचरे के बीच पड़ी एक मासूम सी जान।
जिस दुनिया में आने से पहले ही जिसे ठुकरा दिया गया, उसी दुनिया में आज उसे आखिरी बार गोद में उठाया नम आंखों से
माँ जैसी ममता
सफेद कपड़े में लिपटी एक छोटी सी पोटली। उस पोटली में एक बच्ची है… जिसे किसी ने “बेटी” कहकर नहीं बुलाया।
किसी की ठुकराई हुई जिम्मेदारी अपने हाथों में ली गई
कंधों पर जिम्मेदारी थी, पर दिल में एक माँ का दर्द।
लावारिस बच्ची का अंतिम संस्कार खुद किया। पूरे सम्मान के साथ। पूरे विधि-विधान के साथ।
सवाल जो दिल चीर देता है
9 महीने पेट में रखने वाली माँ कहाँ थी?
“बेटा चाहिए” कहने वाला समाज कहाँ था?
और हम? हम कब तक आँख बंद करके जीते रहेंगे?
एक बच्ची को जीने का मौका नहीं मिला। पर मरने के बाद सम्मान के साथ अंतिम यात्रा जरूर मिली।
ये अंतिम संस्कार नहीं, एक संदेश है
ये संदेश हर उस माँ-बाप के लिए है जो बेटी को बोझ समझते हैं।
ये संदेश हर उस समाज के लिए है जो चुप रहता है।
और ये संदेश हम सबके लिए है कि – “बेटी बचाओ” सिर्फ नारा नहीं, जिम्मेदारी है।
आज उस बच्ची का नाम कोई नहीं जानता।
पर इतिहास उसे “हमारी बेटी” के नाम से याद रखेगा… जिसने लावारिस को अपना बना लिया।
“तुम्हें दुनिया ने नहीं अपनाया बेटा,
पर आज एक माँ ने तुम्हें सीने से लगा लिया।
जाओ, अब सुकून से सो जाना…