बंगाल सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के मीडिया से बातचीत और सार्वजनिक टिप्पणी पर नियंत्रण संबंधी सर्कुलर को लेकर राज्य की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है।
मुख्य सचिव मनोज अग्रवाल की ओर से जारी निर्देश में बिना अनुमति मीडिया में बयान देने, लेख लिखने, सरकारी नीतियों की आलोचना करने तथा सरकारी दस्तावेज साझा करने पर रोक की बात कही गई थी।
इसे लेकर विपक्ष, वकील समुदाय और मीडिया के एक हिस्से ने सरकार पर कर्मचारियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करने का आरोप लगाया।
विवाद बढ़ने और कानूनी सवाल उठने के महज 24 घंटे के भीतर नवान्न ने नई व्याख्या जारी कर आदेश के दायरे को सीमित कर दिया।
संशोधित निर्देश के अनुसार यह नियम केवल राज्य सरकार के नियमित विभागों, सरकारी बोर्डों, नगर निकायों, निगमों और अन्य अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं के कर्मचारियों पर लागू होगा।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार शिक्षा क्षेत्र को इससे बाहर रखा गया है। हालांकि मूल सर्कुलर वापस नहीं लिया गया है। आइएएस, डब्ल्यूबीसीएस और पुलिस सेवा सहित स्थायी सरकारी अधिकारियों पर मीडिया में जानकारी साझा करने संबंधी सख्ती अब भी कायम है।
सरकार का तर्क है कि यह कदम प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखने और संवेदनशील सूचनाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए उठाया गया है।
सरकारी सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली, 1968 तथा बंगाल सरकारी कर्मचारी आचरण नियमों में ऐसे प्रावधान पहले से मौजूद हैं और नया आदेश उन्हीं नियमों के अनुपालन को सख्ती से लागू करने की कोशिश है।