जम्मू संभाग के सीमावर्ती जिलों जम्मू, सांबा और कठुआ में रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी पिछले कुछ वर्षों से सुरक्षा और प्रशासनिक एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। सीमावर्ती क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी को लेकर समय-समय पर जांच, पहचान और सत्यापन अभियान चलाए जाते रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे मामले को केवल अवैध प्रवास के नजरिये से नहीं, बल्कि सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा से जोड़कर भी देखती रही हैं।
जम्मू संभाग में रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी को लेकर स्थानीय स्तर पर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। विशेष रूप से जम्मू शहर और उसके आसपास के इलाकों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे क्षेत्रों में इनकी पहचान और दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर प्रशासन की ओर से समय-समय पर अभियान चलाए गए हैं।
एक दशक पहले तेज हुआ था अभियान
करीब एक दशक पहले जम्मू में रोहिंग्या और अन्य विदेशी नागरिकों की पहचान तथा उनके दस्तावेजों की जांच को लेकर अभियान तेज हुआ था। पुलिस और प्रशासन ने विभिन्न इलाकों में रह रहे लोगों का सत्यापन किया था। उस दौरान कई लोगों की पहचान और उनके दस्तावेजों को लेकर जांच की गई थी। सुरक्षा एजेंसियों की ओर से भी इस पूरी प्रक्रिया पर नजर रखी गई।
घुसपैठ और तस्करी का लगातार खतरा
सीमावर्ती जिलों जम्मू, सांबा और कठुआ की भौगोलिक स्थिति इस मुद्दे को और संवेदनशील बनाती है। ये क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक हैं और सीमा पार से घुसपैठ तथा तस्करी जैसी चुनौतियों का लगातार सामना करते आ रहे हैं। रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी को लेकर केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन की नीतियों में भी समय-समय पर बदलाव और सख्ती देखने को मिली है।
जम्मू में इनकी संख्या सबसे अधिक
जम्मू जिले की बात करे तो पांच हजार रोहिंग्या मुस्लिम नरवाल बाला, भठिंडी, बेलीचराना, छन्नी हिम्मत, तालाब तिल्लो, केसी चौक जैसे इलाकों में झुग्गी बस्ती में रह रहे हैं। हालांकि इनकी संख्या सरकारी आकंड़ों से काफी अधिक है। कहने को ये लोग मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं।
यूनाइटेड नेशंस द्वारा जारी पहचान पत्र के आधार पर यह लोग जम्मू के विभिन्न हिस्सों में रह हैं। रोहिंग्या नागरिकों पर हालांकि पुलिस की पैनी नजर रहती है। थाना स्तर पर सभी रोहिंग्या नागरिकों का हिसाब रखा जाता है।
हीरानगर जेल में बनाया गया डिटेंशन सेंटर
मार्च 2021 में जम्मू में अवैध तरीके से रह रहे रोहिंग्याओं को प्रशासन ने जिला कठुआ की हीरानगर जेल में भेज दिया था। हीरानगर जेल को डिटेंशन सेंटर में तबदील कर दिया गया था। डिटेंशन सेंटर में उन सभी रोहिंग्या नागरिकों को भेजा गया था जिसके बाद यूनाइटेड नेशन का कार्ड नहीं था।
आंकड़ों से कहीं अधिक है संख्या
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश में 6523 रोहिंग्या रहते हैं। इनमें 6461 जम्मू संभाग और 62 कश्मीर में हैं। लद्दाख में भी ये अस्थायी आशियाने बनाकर रह रहे हैं। इनके अस्थायी ठिकाने जम्मू-कश्मीर के पांच जिलों जम्मू, सांबा, डोडा, पुंछ व अनंतनाग में हैं। जम्मू जिले में ही रोहिंग्याओं के 30 स्थानों पर ठिकाने हैं।
2018 के बाद से सरकार की ओर से जम्मू में रह रही रोहिंग्या आबादी से जुड़े कोई भी नए आंकड़े जारी नहीं किए गए है। जानकारों की माने तो सरकारी आकंड़ों से विपरीत जम्मू कश्मीर में रह रहे रोहिंग्या नागरिकों की संख्या काफी अधिकारी है।
मानव तस्करी, हवाला कारोबार जैसे गंभीर आरोप
जम्मू में रह रहे कई रोहिंग्या नागरिकों पर मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी, सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने, हवाला राशि में शामिल होने का शक, फर्जी सरकारी दस्तावेज तैयार करने जैसे संगीन मामले दर्ज है।
इसके अलावा वर्ष 2020 में हुए सुंजवा मुठभेड़ में आतंकियों को सैन्य शिविर के पास शरण देने का आरोप भी रोहिंग्या नागरिकों पर लगा था। हालांकि इसके सुरक्षा एजेंसियों का सबूत नहीं मिले थे।
शहर, प्रदेश और देश के लिए बड़ा खतरा
धर्म रक्षा संगठन के प्रधान मुनीश गुप्ता ने बताया कि ये घुसपैठिएं हमारे शहर, प्रदेश व देश के लिए लगातार खतरा बन रहे हैं। हमने करीब एक दशक पूर्व जम्मू में लगातार बढ़ती रोहिंग्या आबादी के खिलाफ आवाज उठाना शुरू की थी। उसी का प्रभाव था कि प्रशासन हरकत में आया और 2021 में इनका सत्यापन किया गया और जिनके पास उचित दस्तावेज नहीं थे, उन्हें डिटेंशन सेंटर भेजा गया। उसके बाद भी हालांकि हालात काबू नहीं आए।
यहां कश्मीरी नेताओं ने सोची-समझी साजिश के तहत घुसपैठियों को बसाया ताकि जम्मू की भौगोलिक परिस्थितियों को बदला जा सके। आज शहर से बाहर कई ऐसे इलाके हैं, जहां जाने पर यह एहसास होता है कि आप भारत में नहीं।