देश की जीवनदायिनी गंगा को स्वच्छ बनाने की दिशा में इस वर्ष एक बड़ा और ठोस कदम सामने आया है।
स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन यानी एनएमसीजी ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सीवेज ट्रीटमेंट और प्रदूषण नियंत्रण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है।
जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, यह प्रगति केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर गंगा और उसकी सहायक नदियों को साफ करने के लिए लगातार और केंद्रित प्रयासों का परिणाम है।
इस दौरान 18 अलग-अलग परियोजनाओं के जरिए कुल 538.03 एमएलडी यानी रोजाना 53 करोड़ 80 लाख लीटर से अधिक गंदे पानी को साफ करने की नई क्षमता जोड़ी गई है। यह काम उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, बंगाल और बिहार जैसे प्रमुख राज्यों में किया गया है, जिससे साफ दिखता है कि गंगा की पूरी धारा में व्यापक स्तर पर सुधार की कोशिशें हो रही हैं।
उत्तर प्रदेश बना सबसे बड़ा केंद्र
अगर इस पूरे अभियान की बात करें तो उत्तर प्रदेश इसमें सबसे आगे निकलकर सामने आया है। मुरादाबाद, शुक्लागंज, वाराणसी, वृंदावन, प्रयागराज और आगरा जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर काम हुआ है। खासतौर पर वाराणसी के अस्सी-बीएचयू क्षेत्र में अकेले 55 एमएलडी यानी रोज पांच करोड़ 50 लाख लीटर पानी को साफ करने की क्षमता जोड़ी गई, जो इस साल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जा रही है।
प्रयागराज में 13 नालों को रोककर और उन्हें मोड़कर सलोरी एसटीपी से जोड़ा गया, जिससे 43 एमएलडी अतिरिक्त क्षमता तैयार हुई, जिस पर करीब 331.75 करोड़ रुपये खर्च हुए।
डिजिटल निगरानी से पारदर्शिता, हर बूंद पर नजर
गंगा को साफ रखने के लिए अब केवल प्लांट बनाना ही नहीं, बल्कि उनकी निगरानी भी उतनी ही जरूरी हो गई है। इसी दिशा में एनएमसीजी ने ड्रेन डैशबोर्ड और गंगा पल्स पब्लिक पोर्टल जैसे डिजिटल प्लेटफार्म शुरू किए हैं। इनकी मदद से यह देखा जा सकता है कि कौन-सा नाला कितना गंदा पानी नदी में छोड़ रहा है और उसे एसटीपी तक कैसे मोड़ा जा रहा है।
साथ ही, एसटीपी में पानी के प्रवेश बिंदु (इनलेट) और निकलने के बाद (आउटलेट) की गुणवत्ता को भी सार्वजनिक किया जा रहा है, ताकि साफ दिख सके कि गंदा पानी किस तरह साफ होकर बाहर आ रहा है। इससे पारदर्शिता बढ़ती है और जिम्मेदारी तय होती है।
अन्य राज्यों में भी मजबूत पकड़, हर स्तर पर काम जारी
उत्तराखंड में उधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून और मुनि की रेती में अलग-अलग परियोजनाओं के जरिए गंदे पानी के प्रबंधन को बेहतर किया गया। झारखंड के फुसरो में 61.05 करोड़ रुपये की लागत से 14 एमएलडी का प्रोजेक्ट पूरा हुआ, जो उस क्षेत्र के लिए बड़ा कदम है।