वैश्विक राजनीति में चीन का बढ़ता दबदबा, ट्रंप और पुतिन की मेजबानी कर दुनिया को दिया बड़ा रणनीतिक संदेश…

वैश्विक राजनीति में इस हफ्ते जो तस्वीर बीजिंग से निकली, उसने साफ कर दिया कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहे।

कभी पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाने वाला अमेरिका अब चीन के सामने उतना मजबूत नहीं दिख रहा, जबकि रूस भी सबसे भरोसेमंद साथी की तरह बीजिंग के दरवाजे पर खड़ा नजर आया।

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का स्वागत किया, तो दूसरी ओर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ घंटों बातचीत कर दुनिया को यह एहसास दिला दिया कि अब वैश्विक राजनीति की असली धुरी बीजिंग बनता जा रहा है। ट्रंप की यह यात्रा साल 2017 के बाद पहली बीजिंग यात्रा थी। दूसरी तरफ पुतिन की यह चीन की 25वीं आधिकारिक यात्रा थी।

ट्रंप आए, लेकिन खाली हाथ लौटे

बीजिंग में ट्रंप और शी चिनफिंग की मुलाकात के दौरान हर तस्वीर और हर इशारे ने बहुत कुछ कह दिया।शी चिनफिंग का व्यवहार ऐसा था मानो वह दुनिया को बता रहे हों कि अब अमेरिका चीन को दबाने की ताकत खोता जा रहा है।

मुलाकात के बाद ट्रंप को न कोई बड़ा समझौता मिला, न संयुक्त बयान और न ही कोई बड़ी सफलता। सबसे चौंकाने वाला पल तब आया, जब शी चिनफिंग ने थ्यूसीडाइड्स ट्रैप का जिक्र किया।

यह वह सिद्धांत है जिसमें कहा जाता है कि जब कोई नई ताकत तेजी से उभरती है, तो पुरानी ताकत उससे डरकर टकराव की राह पकड़ लेती है।

शी ने सीधे सवाल किया कि क्या चीन और अमेरिका इस टकराव से बचकर नए रिश्तों की शुरुआत कर सकते हैं?

चीन ने ट्रंप की यात्रा के जरिए दुनिया को यह दिखा दिया कि अब वह अमेरिका को अपने लिए सबसे अहम देश नहीं मानता।

पुतिन के लिए चीन बना सबसे बड़ा सहारा

जहां ट्रंप को ज्यादा सफलता नहीं मिली, वहीं पुतिन अपने पुराने और अच्छे दोस्त शी चिनफिंग के साथ मजबूत रिश्तों का प्रदर्शन करते नजर आए। दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीक और ऊर्जा समेत करीब 20 समझौते हुए। यूक्रेन युद्ध के बीच रूस के लिए चीन सबसे बड़ा आर्थिक सहारा बन चुका है।

बीजिंग में एक निजी मुलाकात के दौरान ट्रंप ने जब पूछा कि क्या शी दूसरे नेताओं को भी अपने बेहद गोपनीय झोंगनानहाई परिसर में बुलाते हैं, तो शी ने कहा कि ऐसा बहुत कम होता है, लेकिन पुतिन यहां आ चुके हैं।

हालांकि चीन ने पुतिन की हर मांग पूरी नहीं की। रूस चाहता था कि पावर आफ साइबेरिया-2 गैस पाइपलाइन परियोजना पर अंतिम समझौता हो जाए, ताकि रूसी गैस सीधे चीन पहुंच सके। दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ी, लेकिन अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए।

अब दुनिया की राजनीति बीजिंग से होकर गुजरेगी

कभी दुनिया की राजनीति अमेरिका के इर्द-गिर्द घूमती थी। वॉशिगटन तय करता था कि किस देश से दोस्ती करनी है और किसे अलग-थलग करना है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। ट्रंप और पुतिन दोनों को बीजिंग आना पड़ा।

दोनों को चीन की जरूरत महसूस हुई। यही सबसे बड़ा संकेत है कि दुनिया की नई ताकत कौन बन रही है। चीन अब अमेरिका और रूस को आपस में लड़ाने की राजनीति नहीं कर रहा, बल्कि खुद को उस केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है, जहां से होकर बड़ी ताकतों की राजनीति गुजरती है।

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