आठ दशकों तक जापान की सुरक्षा नीति तीन पवित्र नियमों पर टिकी थी, पहला- सैन्य ताकत का कोई खास इस्तेमाल नहीं, दूसरा- हथियारों का कोई निर्यात नहीं और तीसरा- रक्षा पर कम से कम खर्च। ये पांबिदियां सिर्फ नीतियां नहीं थीं, बल्कि ये युद्ध के बाद बनी जापान की पहचान का आधार थीं।
1890 के दशक से 1945 के बीच, जापान के साम्राज्यवादी विस्तार के कारण पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया पर कब्जा, बड़े पैमाने पर हिंसा, जबरन मजदूरी, यौन गुलामी और युद्ध के दौरान अत्याचार हुए। ये अनुभव चीन, कोरिया, फिलीपींस और अन्य जगहों पर राष्ट्रीय इतिहास, शिक्षा, संग्रहालयों और परिवारों की यादों में बसे हुए हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद, जापान ने शांतिवाद को इसलिए अपनाया ताकि न सिर्फ टोक्यो के विकल्प सीमित हों, बल्कि पड़ोसियों को यह भरोसा भी दिलाया जा सके कि साम्राज्यवादी आक्रमकता दोबारा नहीं होगी।
युद्ध के बाद बनीं संस्थाएं, माफी मांगने की कूटनीति और सैन्य अड्डों व हथियारों पर पाबंदियां एक क्षेत्रीय सामाजिक समझौते का हिस्सा बन गईं। लेकिन पिछले दशक में, टोक्यो ने धीरे-धीरे युद्ध के बाद की इन बंदिशों को कमजोर किया है।
रक्षा बजट बढ़ रहे हैं, सैन्य क्षमताएं फिर से बनाई जा रही हैं, हथियारों की बिक्री शुरू हो गई है, एक केंद्रीय खुफिया एजेंसी नए सिरे से बनाई जा रही है, और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जापान अब देश की सुरक्षा में परमाणु हथियारों की भूमिका पर बहस करने से भी पीछे नहीं हट रहा है।
जापान की नीति में बदलाव को ऐतिहासिक उकसावे के रूप में देखता है चीन
चीन के लिए यह सिर्फ नीति में बदलाव नहीं है, यह एक ऐतिहासिक उकसावा है जो साम्राज्यवादी सैन्यवादी दौर की दर्दनाक यादों को फिर से ताजा कर देता है।
अमेरिका का एक तकनीकी रूप से उन्नत सहयोगी, जिसने कभी खुद को सीमित रखा था, अब एक ऐसी सैन्य ताकत में बदल रहा है जिसकी पहुंच और प्रभाव पूरे एशिया और उससे आगे तक है।
बीजिंग को लग रहा है कि उसका रणनीतिक दायरा सिकुड़ रहा है क्योंकि उसका जानलेवा दुश्मन एक बार फिर अपनी ताकत दिखा रहा है।
चीन क्यों है परेशान?
जापान की रक्षा नीति में बदलाव को लेकर चीन की चिंता तीन वजहों से है, पहली- इतिहास, दूसरी- हार्ड पावर, तीसरी- गठबंधन।
पहली वजह इतिहास है, जो चीन की घरेलू और विदेशी नीति में एक अहम भूमिका निभाता है। युद्ध के समय जापान द्वारा किए गए अत्याचारों की यादें कम्युनिस्ट पार्टी के उस दावे को मजबूती देती हैं कि उसने देश को बचाया था, और जब भी टोक्यो अपनी सीमाओं को लांघता हुआ दिखता है, तो इन यादों का इस्तेमाल किया जाता है।
जापान के किसी भी कदम को बीजिंग ‘साम्राज्यवादी सैन्यवादी सोच’ की ओर वापसी के तौर पर पेश कर सकता है, भले ही उसका मकसद सिर्फ ‘डिटरेंस’ ही क्यों न हो। इस नजरिए को दक्षिण कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में भी समर्थन मिलता है, जिससे जापान की कूटनीति मुश्किल हो जाती है।
दूसरी वजह ‘हार्ड पावर’ है; चीन जापान के इस बदलाव को क्षेत्रीय संतुलन में अपने लिए नुकसानदेह बदलाव के तौर पर देखता है। जापान का रक्षा पर GDP का 2% खर्च करने का लक्ष्य, जवाबी हमले की क्षमता, आधुनिक SDF (जापान की सेना) और मजबूत रक्षा-औद्योगिक आधार – ये सब मिलकर चीन की पूर्वी सीमा पर उसकी सैन्य क्षमता में भारी बढ़ोतरी करते हैं।
इससे PLA के लिए ताइवान या दक्षिण चीन सागर में अपनी ताकत लगाने से पहले जापान की मज़बूत जवाबी कार्रवाई की चिंता करना जरूरी हो जाता है। इसके अलावा, दक्षिण-पूर्व एशिया को जापान द्वारा हथियारों (जैसे पेट्रोल वेसल, रडार सिस्टम या तटीय रक्षा मिसाइलें) के संभावित निर्यात से छोटे पड़ोसी देशों पर चीन का दबदबा और कम हो जाता है।
तीसरी वजह गठबंधन की गतिशीलता है, जो इन चिंताओं को और बढ़ा देती है। जापान के सुधार अमेरिका के नेतृत्व वाली साझेदारियों में गहरे एकीकरण के साथ आते हैं, जैसे अमेरिका और दक्षिण कोरिया के साथ त्रिपक्षीय सहयोग, ऑस्ट्रेलिया और UK के साथ करीबी संबंध, और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अन्य छोटे समूहों के साथ जुड़ाव।
जैसे-जैसे टोक्यो की क्षमता बढ़ती है, अमेरिका की आपातकालीन योजनाओं में समुद्री निगरानी, पनडुब्बी-रोधी युद्ध, मिसाइल रक्षा और लॉजिस्टिक्स में जापानी संसाधनों को शामिल किया जा सकता है। चीन के लिए इसका मतलब है कि क्षेत्र में किसी भी संकट के दौरान यह सिर्फ दो देशों के बीच का मुकाबला रहने के बजाय, एक ऐसे गठबंधन का रूप ले सकता है जिसमें जापान की ताकत मुख्य भूमिका में हो।