‘बचपन में स्कूल आते-जाते तालाब से मीठे सिंघाड़े निकालकर खाते थे। 40 वर्ष बाद उसी तालाब में गंदगी और अवैध कब्जों को देखकर मन द्रवित हो जाता था। मन में सवाल उठता कि प्रकृति भी तो पूजा है, आज तालाब को नहीं बचाया तो खुद को क्या जवाब दूंगा? तालाब को कब्जों से मुक्त कराके मैने बचपन में उससे खाए सिंघाड़ों का कर्ज चुकाया है।’
यह कहते हुए भूरी सिह के चेहरे पर आए भाव तालाब और प्रकृति के प्रति उनके प्रेम को व्यक्त कर देते हैं। अंगूठी गांव निवासी दसवीं पास दूध का काम करने वाले 52 वर्ष के भूरी सिंह पांच वर्ष से तालाब को अवैध कब्जों से मुक्त कराने और उसे पुराने स्वरूप में वापस लाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वह बताते हैं कि 40 वर्ष पहले यह आसपास के गांव का सबसे बड़ा तालाब था।
वह स्कूल आते-जाते तालाब में लगाए सिंघाड़े खाते थे। तालाब के मीठे सिंघाड़े पूरे गांव में प्रसिद्ध थे। उनकी आंखों के सामने तालाब पर अवैध कब्जे होते चले गए। गांव के घरों के गंदे पानी की निकासी से तालाब के पानी का रंग बदलता गया, सिंघाड़ों की बेल 25 वर्ष पहले ही उससे गायब हो चुकी थी। वह जब भी तालाब के पास से निकलते तो उसे गंदगी और कब्जों से कराहता देख मन द्रवित हो उठता था।
पांच वर्ष पहले तालाब को पुरानी स्थिति में लाने का अभियान चलाया। प्रशासन के अधिकारियों से अवैध कब्जों को हटवाने के लिए प्रार्थना पत्र दिए, दर्जनों चक्कर लगाए। अधिकारियों के सुनवाई नहीं करने पर पिछले वर्ष राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में मामले को लेकर गए थे।
तालाब पर प्रशासन लगवाए बोर्ड
भूरी सिंह कहते हैं कि तालाब पर दोबारा अवैध कब्जा नहीं हो, इसे लेकर प्रशासन वहां पर चेतावनी बोर्ड लगवाए। जिस पर अवैध करने पर कार्रवाई करने की स्पष्ट चेतावनी हो। साथ ही निरंतर निगरानी की व्यवस्था भी की जाए।