विधानसभा ने राज्य में अवैध मतांतरण की चुनौतियों से निपटने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाते हुए ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक-2026’ को गुरुवार को ध्वनिमत से पारित कर दिया।
इसके तहत अब बलपूर्वक, प्रलोभन या धोखाधड़ी से कराए जाने वाले सामूहिक मतांतरण के दोषियों को आजीवन कारावास तक की कठोर सजा भुगतनी होगी।
इस नए कानून में विशेष रूप से महिलाओं, नाबालिगों, अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़ा वर्ग के व्यक्तियों के साथ होने वाले अवैध मतांतरण के मामलों में 20 वर्ष तक की कैद का सख्त प्रविधान किया गया है।
साथ ही डिजिटल माध्यमों से दिए जाने वाले प्रलोभन को भी अपराध की श्रेणी में शामिल कर सभी संबंधित अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है।
छह अध्यायों और 31 बिंदुओं में विस्तृत इस विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें पैतृक धर्म में वापसी को मतांतरण के दायरे से बाहर रखा गया है और इन गंभीर मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए प्रत्येक जिले में विशेष सत्र न्यायालय गठित करने का निर्णय लिया गया है, ताकि राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता और धार्मिक स्वतंत्रता को अवैध दखल से पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सके। ये विधेयक छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 1968 की जगह लेगा।
विजय शर्मा ने पेश किया प्रस्ताव, विपक्ष का बहिष्कार
मुख्यमंत्री बनने के बाद विष्णु देव साय ने घोषणा की थी कि जबरन मतांतरण रोकने के लिए कड़ा कानून लाया जाएगा।
इसी के तहत गृह मंत्री सह उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने सदन में ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026’ पेश किया। इसके लिए जैसे ही विजय शर्मा ने आसंदी से अनुमति मांगी तब नेता प्रतिपक्ष डा. चरण दास महंत ने इस पर आपत्ति जताई।
महंत ने कहा कि 11 राज्यों के ऐसे ही कानून फिलहाल उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन हैं, इसलिए इस विधेयक पर सदन में जल्दबाजी में विचार नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि इस विधेयक को व्यापक विचार-विमर्श के लिए प्रवर समिति को भेजा जाना चाहिए। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि उच्चतम न्यायालय की ओर से ऐसी कोई रोक नहीं है, जो राज्यों को इस तरह के कानून बनाने से रोकती हो।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकारों को सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों पर कानून बनाने का अधिकार है।
उन्होंने कहा कि यह विधेयक विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया है। इसके बाद विपक्ष ने सदन से बहिष्कार कर दिया। वहीं भाजपा विधायक ने जय श्रीराम के नारे लगाए।
मतांतरण के लिए ये होगी प्रक्रिया
जो व्यक्ति मतांतरण करना चाहेगा, उसे प्राधिकृत अधिकारी के पास आवेदन करना होगा। इसके बाद उस व्यक्ति की जानकारी वेबसाइट, ग्राम पंचायत व संबंधित थाने में प्रदर्शित की जाएगी। 30 दिन के भीतर दावा आपत्ति व जांच की प्रक्रिया होगी।
गवाहों से पूछताछ, शपथ पत्र व अन्य जानकारी ली जाएगी। इसके बाद वैध आवेदन घोषित किया जा सकेगा। वैध निर्धारित की तिथि से 90 दिन के भीतर मतांतरण नहीं हुआ तो इस आवेदन की प्रक्रिया समाप्त मानी जाएगी।
सजा और जुर्माने के कड़े प्रावधान
सामान्य मामला: अवैध मतांतरण पर सात से 10 साल की जेल और न्यूनतम पांच लाख रुपये का जुर्माना।
विशेष श्रेणी: यदि पीड़ित नाबालिग, महिला, एससी-एसटी या ओबीसी वर्ग से है, तो सजा 10 से 20 साल की जेल और न्यूनतम 10 लाख रुपये का जुर्माना।
सामूहिक मतांतरण: इस स्थिति में सजा 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक हो सकती है और जुर्माना कम से कम 25 लाख रुपये होगा।
मतांतरण के लिए हुए विवाह होंगे अवैध
अंतरधार्मिक विवाह कराने वाले धर्मगुरु (फादर, प्रीस्ट, मौलवी आदि) को विवाह से आठ दिन पहले सक्षम प्राधिकारी के सामने घोषणापत्र देना होगा। यदि अधिकारी को लगता है कि विवाह का मुख्य उद्देश्य केवल मतांतरण है, तो ऐसे विवाह को अवैध घोषित किया जा सकता है।