छत्तीसगढ़; धमतरी: अराजपत्रित अधिकारी को जनपद CEO का पद और वित्तीय शक्तियां सौंप उड़ाई जा रही नियमों की धज्जियां… सारे नियम क़ायदे छोटे कर्मचारियों व आम जनता के लिए ही है?

सैयद जावेद हुसैन (सह संपादक – छत्तीसगढ़):

धमतरी- जिला पंचायत धमतरी मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) की मनमानी ने प्रशासनिक व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। ट्रेजरी नियमों, गजट अधिसूचना और राज्यपाल के आदेशों को ताक़ में रखते हुए CEO ने एक अराजपत्रित अधिकारी को जनपद पंचायत नगरी का CEO नियुक्त कर दिया, इतना ही नहीं, उसी कर्मचारी को ड्राइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (DDO) का वित्तीय अधिकार भी सौंप दिया, जो पूरी तरह से नियमों के विरुद्ध है।

आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में यह नियुक्ति और भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है, क्योंकि नियमों के मुताबिक ट्राइबल क्षेत्रों में केवल आदिवासी कल्याण विभाग या उसके अधिकारी ही जनपद CEO पद पर नियुक्त किए जाते हैं।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ज़िला CEO ने करारोपण अधिकारी को जनपद पंचायत नगरी का CEO बना दिया, जबकि यह पद राजपत्रित अधिकारी के लिए आरक्षित है। ट्रेजरी नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि DDO का अधिकार केवल राजपत्रित अधिकारी को ही दिया जा सकता है। लेकिन ज़िला CEO की मनमानी यहां नहीं रुकी, एक करारोपण अधिकारी को न केवल जनपद CEO बनाया, बल्कि वित्तीय शक्तियां भी सौंप दीं, जिससे करोड़ों रुपये के बजट पर अनधिकृत नियंत्रण का खतरा मंडरा रहा है।

इस मामले में सबसे बड़ा घोटाला नियुक्ति प्रक्रिया में हुआ है। जनपद CEO पद के लिए फाइल सहायक आयुक्त आदिम जाति कल्याण विभाग से चलनी थी, लेकिन मनमानी करते हुए फाइल को जिला पंचायत धमतरी में घुमाकर अनधिकृत तरीके से ये नियुक्ति दे दी गई। आदिवासी क्षेत्र होने के कारण ये नियुक्ति और भी आपत्तिजनक हो जाती है, जहां केवल ट्राइबल विभाग का अधिकारी ही जनपद CEO बन सकता हैं। जनपद CEO की अनुपस्थिति में प्रभार या अतिरिक्त प्रभार कौन संभालेगा? यह भी अस्पष्ट है, क्योंकि अराजपत्रित अधिकारी को कोई वैधानिक अधिकार नहीं होते।

यह मामला भ्रष्टाचार, नियमों की अवहेलना और आदिवासी हितों पर कुठाराघात का जीता-जागता प्रमाण है। स्थानीय लोग और पंचायत प्रतिनिधि आरोप लगा रहे हैं कि ज़िला CEO की यह मनमानी व्यक्तिगत लाभ और पक्षपात के लिए की गई है। इस मामले में जिला प्रशासन चुप्पी साधे हुए है, जबकि ट्रेजरी और गजट नियमों का खुला उल्लंघन हो रहा है।

आदिवासी संगठनों ने इसे ट्राइबल अधिकारों का हनन बताते हुए जांच की मांग की है। यदि तत्काल कार्रवाई नहीं हुई, तो जनपद पंचायत नगरी में वित्तीय अनियमितताएं और प्रशासनिक अराजकता बढ़ सकती है। 

राज्य सरकार और जिला कलेक्टर से सवाल: 

कब तक ऐसी मनमानी चलती रहेगी? मामला न केवल धमतरी, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के पंचायती राज व्यवस्था पर कलंक है। इसकी गहन जांच हो, दोषी बख्शे न जाएं!

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