केंद्र सरकार ने मंगलवार को पराली जलाने का मौसम चरम पर पहुंचने से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और एनसीआर में पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए मिशन मोड में काम करने के निर्देश दिए।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी बैठक में पराली प्रबंधन की समीक्षा की गई।
पराली जलाने से मिट्टी के पोषक तत्वों और सूक्ष्मजीवों को नुकसान पहुंचता है तथा दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण बढ़ता है।
बैठक में राज्यों से जिलाधिकारियों के साथ तत्काल बैठकें करने और प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने को कहा गया।
दोनों मंत्रियों ने कहा कि धान की कटाई और रबी फसलों की बुवाई के बीच कम समय बचा है, इसलिए प्रशासन को कागजी कार्रवाई के बजाय जमीन पर तेजी से काम करना होगा।
शिवराज सिंह चौहान ने 15 सितंबर से 12 अक्टूबर तक के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं 53.3 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में करीब 32 प्रतिशत घटी हैं। पंजाब में भी कमी दर्ज की गई है।
हालांकि, मध्य प्रदेश में घटनाएं 55 से बढ़कर 277 हो गईं, जो 452 प्रतिशत की वृद्धि है। राजस्थान में मामले 20 से बढ़कर 60 हो गए, यानी 200 प्रतिशत की वृद्धि।
कृषि मंत्री ने इसे चिंताजनक बताते हुए दोनों राज्यों को प्रभावित जिलों और गांवों के लिए विशेष कार्ययोजना लागू करने को कहा है। उन्होंने कहा कि किसानों को केवल पराली नहीं जलाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें आसान, सुलभ और किफायती विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे।
पराली को खेत में मिलाने से जैविक खाद तैयार होती है। इसके अलावा, फसल अवशेषों का इस्तेमाल जैव-सीएनजी, जैव-एथनाल, बिजली उत्पादन और पशु चारे के लिए किया जा सकता है, जिससे किसानों की अतिरिक्त आय भी बढ़ सकती है।
केंद्र अब तक राज्यों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए तीन लाख 54 हजार से अधिक मशीनें उपलब्ध करा चुका है। इनमें चालू वित्त वर्ष में दी गई 26,109 मशीनें शामिल हैं।
केंद्र ने वर्ष 2018-19 से 2025-26 के बीच फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत राज्यों को 4,266.47 करोड़ रुपये जारी किए। इसमें पंजाब को 2,056.50 करोड़, हरियाणा को 1,171.71 करोड़, उत्तर प्रदेश को 868.67 करोड़ और मध्य प्रदेश को 59 करोड़ रुपये मिले।
धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच किसानों को महज 20 से 25 दिन मिलते हैं। ऐसे में अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक का समय पराली प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण होगा।