पुलिस के दोहरे व्यवहार पर बॉम्बे हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, थाने में धौंस दिखाने पर जताई नाराजगी…

आम आदमी पुलिस की धौंस से अच्छी तरह वाकिफ है, लेकिन अदालतों को भी इससे दो-चार होना पड़ता है। बांबे हाई कोर्ट की पुलिस पर एक तल्ख टिप्पणी से इसे समझा जा सकता है।

हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अदालतों के सामने पुलिस का व्यवहार सहयोगपूर्ण होता है, लेकिन थाने में वह धौंस दिखाती है।

हाई कोर्ट ने एक पुलिस अधिकारी पर लगाए गए जुर्माने के आदेश को वापस लेने से इनकार करते हुए यह टिप्पणी की। यह जुर्माना उस पर इसलिए लगाया गया था, क्योंकि उसने बार-बार अनुरोध किए जाने के बाद भी आरोपितों को शिकायत की कापी नहीं दी।

कार्यवाहक चीफ जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखड़ की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें अदालत से पालघर के वाडा पुलिस स्टेशन के एसएचओ पर 25 हजार का जुर्माना लगाने वाले जून के उसके आदेश को वापस लेने का अनुरोध किया गया था।

अतिरिक्त लोक अभियोजक मनकुंवर देशमुख ने कहा कि जिस अधिकारी पर जुर्माना लगाया गया है, वह शिकायत की कापी रोकने के लिए जिम्मेदार नहीं है, बल्कि किसी दूसरे अधिकारी ने कापी उपलब्ध नहीं कराई। हाई कोर्ट ने हालांकि इस स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया और अदालत व थाने में पुलिस अधिकारियों के व्यवहार के बीच अंतर पर टिप्पणी की।

उच्च न्यायालय ने कहा, “यहां अदालत में आपके अधिकारी बहुत सहयोगपूर्ण व्यवहार दिखाते हैं, लेकिन पुलिस स्टेशन में वे धौंस दिखाते हैं।” कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा, “हमें अपने आदेश में कोई त्रुटि मिली।”

कोर्ट ने जून में भी जताई थी नाराजगी

जून में अपने आदेश में इसी पीठ ने पुलिस अधिकारियों के प्रति नाराजगी जाहिर की थी कि उन्होंने आरोपित व्यक्तियों को शिकायत या प्राथमिकी की कापी मुहैया नहीं कराई, जो कानूनी रूप से जरूरी है।

हाई कोर्ट तब एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जो उन लोगों की ओर से दायर की गई थी, जिनके खिलाफ वाडा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। उनका दावा था कि वे थाने में गए और प्राथमिकी की कापी मांगी, लेकिन एसएचओ ने कापी नहीं दी।

अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए विवश

पीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि उसके समक्ष ऐसी कई याचिकाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें जिन लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं, उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होना पड़ता है, क्योंकि पुलिस अधिकारी उन्हें शिकायत या प्राथमिकी की कापी देने से मना कर देते हैं।

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