गुजरात के नर्मदा जिले के आदिवासी परिवारों को संजीवनी मिल गई है। अब तक साढ़े छह सौ परिवार बायोगैस प्लांट लगाकर अपने घर की रसोईं की जरूरत को पूरा कर रहे हैं।
दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के पास रहने वाले करीब एक हजार आदिवासी परिवार रसोई गैस के मामले में आत्मनिर्भर बनने की राह पर अग्रसर हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत वर्ष राष्ट्रीय एकता दिवस परेड के दौरान स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास रहने वाले 1000 आदिवासी घरों में बायोगैस प्लांट स्थापित करने की घोषणा की थी।
नर्मदा जिले की गरुड़ेश्वर तहसील की 38 ग्राम पंचायतों के 89 गांवों में यह योजना लागू की गई है। इन परिवारों को पारंपरिक लकड़ी के ईंधन से होने वाले प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के लिए यह योजना प्रारंभ की गई थी।
वाघपुरा गांव निवासी रवि के जीवन में इस बायोगैस प्लांट के कारण बड़ा बदलाव आया है। उनके अनुसार, अब उन्हें न तो ईंधन के लिए लकड़ी की चिंता है और न ही एलपीजी सिलेंडर का झंझट। बायोगैस प्लांट के जरिये रोजाना स्वच्छ ईंधन मिलता है।
चूल्हे पर खाना बनाने के कारण आंखों को नुकसान होता था। लेकिन, अब बायोगैस के उपयोग से उन्हें धुएं से मुक्ति मिल गई है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में राज्य के ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए ऐसी योजनाओं को तेजी से लागू किया जा रहा है।
अब तक यहां 665 से अधिक बायोगैस प्लांट स्थापित किए जा चुके हैं और बाकी प्लांट लगाने का काम तेजी पर है। प्लांट को स्थापित करने का पूरा खर्च सरकार उठाती है। लाभार्थी को प्लांट के लिए जरूरी गड्ढा खोदना पड़ता है।