केरलम के वायनाड में मंगलवार को मेप्पाडी-कल्लाडी टनल रोड प्रोजेक्ट के निर्माण स्थल पर हुए भूस्खलन में अब तक सात लोगों की मौत हो गई है। यह कोई अचानक आई प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि एक ऐसा हादसा था जिसकी भविष्यवाणी पहले ही की जा चुकी थी।
एनडीटीवी ने वायनाड सुरंग निर्माण कार्य के उप-ठेकेदार दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड (डीबीएल) द्वारा तैयार की गई एक आंतरिक रिपोर्ट के हवाले से बताया कि हादसे से पहले ही सुरंग के उत्तरी प्रवेश द्वार के ऊपर की पहाड़ी तेजी से टूट रही थी।
इसमें साफ चेतावनी दी गई थी कि भारी बारिश और आंतरिक जल भराव के कारण यह ढलान (पहाड़) किसी भी समय अचानक ढह सकता है। चेतवानी के बावदूद सुरक्षा मानकों में लापरवाही हुई, जिसके कारण बारिश होते ही लैंडस्लाइड हुआ और सात मजदूरों की जान चली गई।
यह आंतिरक रिपोर्ट डीबीएल के वरिष्ठ भूविज्ञानी राजू सागर, जीएसआई के ए रमेश कुमार और टर्किश इंजीनियरिंग कंसल्टिंग एंड कॉन्ट्रैक्टिंग के प्राधिकरण अभियंता डॉ. एच.के. सिंह द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया था।
रिपोर्ट में क्या-क्या आया सामने?
दरअसल, इस निर्माणाधीन टनल की साइट का निरीक्षण करने वाले इंजीनियरों ने देखा कि टनल के मुहाने के ऊपर की पहाड़ी पर लगभग 35 मीटर मोटी, ढीली, गाद वाली मिट्टी की एक मोटी परत थी, यह मिट्टी कठोर चट्टान के ऊपर स्थित थी।
ऐसे में मिट्टी का निकास ठीक से नहीं हो सकता। भारी बारिश के चलते पानी मिट्टी के अंदर ही भर जाता है, जिसके कारण मिट्टी भारी हो जाती है और खिसकने के चांस बढ़ जाते हैं। इस मिट्टी को स्थिर रखने के लिए कंपनी ने ढलान को सीढ़ियों के रूप में काटा था, उस पर शॉटक्रेट नामक कंक्रीट की एक पतली परत का छिड़काव किया था, और सॉइल नेल्स नामक धातु की छड़ें गाड़ दी थीं।
लेकिन रिपोर्ट में बताया गया है कि निरीक्षण के वक्त ही ढलान ढहने लगी थी। इंजीनियरों ने निरीक्षण के दौरान कटी हुई सतह पर कई स्तरों पर दरारें चौड़ी होती देखीं, किनारों से मिट्टी खिसकती देखी, कीचड़ वाला पानी रिसता देखा, और मिट्टी के अंदर ही गुहाएं बनती देखीं।
मिट्टी के भीतर भर रहा था पानी
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इंजीनियरों को ढलान के दो आधार स्तरों के बीच की खाई में भूमिगत जल प्रवाह की आवाज सुनाई दी। यानी इसका साफ मतलब था कि पानी ने ढीली मिट्टी में एक गुप्त रास्ता बना लिया था और यह पानी उसके भीतर भर रहा था।
ऊपर से भले ही ठोस दिख रहा था, लेकिन वह धीरे-धीरे पहाड़ी को अंदर से बहा रहा था। इसको लेकर इंजीनियरों ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि इस तरह का आंतरिक कटाव ढलान को तेजी से कमजोर कर सकता है।
सुरक्षा तंत्र फेल
रिपोर्ट के अनुसार, बाईं ओर का ढलान दाईं ओर की तुलना में अत्यधिक जोखिम भरा है, जो भारी बारिश में कभी भी ढह सकता है। वहां भूस्खलन रोकने वाले सुरक्षा तंत्र फेल थे, जल निकासी के छेद काम नहीं कर रहे थे और पूर्व-चेतावनी देने वाले उपकरण (पीजोमीटर) स्थापित ही नहीं किए गए थे। इंजीनियरों ने स्वयं स्वीकार किया कि उपयोग में लाया जा रहा एकमात्र निगरानी उपकरण, जमीन पर दिखाई और सुनाई दे रही परेशानी को सटीक रूप से नहीं बता रहा था।
रेलवे इंजीनियरों का दावा
कोंकण रेलवे के इंजीनियर ने दावा किया है कि रिपोर्ट आने के बाद काम रोक दिया गया था और सुरक्षा के मानक उपाय अपनाए गए थे। उनके अनुसार, ऊपर से हुए भूस्खलन को किसी भी सुरक्षा उपाय से रोकना मुमकिन नहीं था।
सुरक्षा मानकों में चूक या गलत गणना?
हालांकि, इंजीनियर इस बात का संतोषजनक जवाब नहीं दे सके कि जिस क्षेत्र में मिट्टी का भंडारण किया गया था, वहां खुदाई से निकाली गई मिट्टी को रोकने के लिए बनाई गई गैबियन दीवारें और अन्य संरचनाएं आवश्यक मानकों के अनुसार क्यों नहीं बनाई गईं। उनके जवाब में यह भी स्पष्ट नहीं था कि क्या उत्तरी प्रवेश द्वार पर सुरंग विस्फोट कार्य के लिए क्षेत्र की तैयारी में उनसे कोई चूक हुई थी या उनसे कोई गलत गणना हुई थी।