‘बूढ़े’ हो रहे जर्मनी में भारतीयों के लिए नौकरी के अवसर मिल रहे हैं। जर्मनी स्वास्थ्य सेवा और आईटी जैसे क्षेत्रों में कुशल श्रमिकों की लगातार कमी से जूझ रहा है।
इस संकट का मुख्य कारण बढ़ती उम्र वाली आबादी और जर्मन मूल के लोगों का कार्यबल में शामिल होना कम होना है। नियोक्ता अब इस कमी को पूरा करने के लिए भारत से कुशल श्रमिकों की तलाश कर रहे हैं।
बर्टेल्समन फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, जर्मनी की अर्थव्यवस्था को हर साल 2,88,000 विदेशी कर्मचारियों की जरूरत है।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो 2040 तक जर्मनी की वर्कफोर्स 10 प्रतिशत तक कम हो सकती है। जहां जर्मनी में कम जन्म दर एक समस्या है, वहीं भारत में 25 वर्ष से कम आयु के 60 करोड़ लोग हैं, जो एक बड़ा वर्कफोर्स प्रदान करते हैं।
भारत और जर्मनी के बीच 2022 में ‘माइग्रेशन और मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर होने के बाद से भारतीयों के लिए वहां काम करना काफी आसान हो गया है।
इसके बाद, 2024 के अंत में जर्मनी ने भारतीय नागरिकों के लिए स्किल्ड वर्क वीजा कोटा 20,000 से बढ़ाकर 90,000 प्रति वर्ष कर दिया था।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2015 में जर्मनी में जहां केवल 23,320 भारतीय कर्मचारी थे, वहीं 2024 तक यह संख्या बढ़कर 1,36,670 हो गई थी।
‘इंडिया वर्क्स’ और ‘मैजिक बिलियन’ जैसी भर्ती एजेंसियां लगातार भारतीय युवाओं को जर्मनी में प्रशिक्षण और नौकरियों के लिए भेज रही हैं। अच्छी सैलरी, शानदार जीवनशैली और बेहतर नौकरी सुरक्षा भारतीयों को अपनी ओर खींच रही है।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, यह बदलाव 2021 में शुरू हुआ। जर्मनी कुशल कारीगरों के लिए काम करने वाली एक संस्था को एक भारतीय भर्ती एजेंसी से अप्रत्याशित ईमेल मिला। ईमेल में लिखा था, ”हमारे पास व्यावसायिक प्रशिक्षण की तलाश में कई युवा, उत्साही लोग हैं और हम जानना चाहते हैं कि क्या आप इसमें रुचि रखती हैं।”
उस समय, जर्मन नियोक्ता पहले से ही रिक्त पदों को भरने के लिए संघर्ष कर रहे थे। वान उंगेर्न-स्टर्नबर्ग संस्था ने बीबीसी को बताया, ”हमारे पास कई हताश नियोक्ता थे, जिनके पास काम करने के लिए कोई नहीं मिल रहा था। इसलिए हमने इसे एक मौका देने का फैसला किया।”
उन्होंने कहा कि श्रमिकों की कमी से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में कसाईखाना रहा है, जो पिछले दो दशक से लगातार गिरावट का सामना कर रहा है। स्थानीय कसाई संघ के प्रमुख जोआचिम लेडेरर ने कहा कि कसाईखाना बहुत मेहनत का काम है। उन्होंने बीबीसी को बताया ‘पिछले लगभग 25 वर्षों से युवा अन्य क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं।”