मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि तलाकशुदा बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं रखा जा सकता।
यदि अविवाहित, विधवा और विवाहित बेटियों को परिवार का सदस्य माना जाता है तो केवल वैवाहिक स्थिति बदल जाने के आधार पर तलाकशुदा बेटी को इस अधिकार से वंचित करना संविधान के समानता के सिद्धांत के विरुद्ध होगा।
इसके साथ ही हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश होम गार्ड विभाग को तलाकशुदा बेटी को पारिवारिक पेंशन का लाभ देने का आदेश दिया।
याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी ज्योति श्रीवास्तव की ओर से तर्क दिया गया कि उनके पिता होम गार्ड विभाग में जिला कमांडेंट थे।
वर्ष 2001 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपनी तलाकशुदा बेटी (ज्योति) को फैमिली पेंशन के लिए नामिनी बनाया था, क्योंकि वह उन पर आश्रित थी।
पिता के निधन के बाद जब पेंशन लाभ का मामला सामने आया तो विभाग ने यह कहते हुए आवेदन निरस्त कर दिया कि तलाकशुदा बेटी परिवार की श्रेणी में नहीं आती। इसके बाद उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पेंशन नियम 1976 में अविवाहित, विधवा और विवाहित बेटियों को परिवार का सदस्य माना गया है। लिहाजा, तलाकशुदा बेटी को अलग श्रेणी में रखकर अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप होनी चाहिए कानून की व्याख्या
कोर्ट ने कहा कि कानून की व्याख्या सामाजिक वास्तविकताओं और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए। आज बड़ी संख्या में महिलाएं तलाक के बाद अपने मायके पर निर्भर रहती हैं।
ऐसी स्थिति में केवल नियमों में नाम का उल्लेख न होने के आधार पर उन्हें अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। ऐसा करना अनुच्छेद-14 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है।