बारूद की गंध से दूर होता बस्तर, अब कॉफी की महक में खिल रही है नई ज़िंदगी…

बस्तर के जंगलों में कभी जिन हाथों में बंदूक और बारूद हुआ करते थे, वही हाथ आज चाय और काफी के कप सजा रहे हैं। चेहरे पर मुस्कान लिए जब फगनी उसेंडी ग्राहकों को चाय परोसती है, तो यकीन करना मुश्किल होता है कि यही हाथ कभी माओवादी दस्तों संग जंगलों में लड़ाई के लिए तैयार रहते थे।

वर्ष 2005 में सलवा जुडूम आंदोलन के दौर में 10 साल की फगनी माओवादी संगठन के संपर्क में आई। फगनी बताती है कि ओरछा के आश्रम स्कूल में पांचवीं तक पढ़ने के बाद जब वह अबूझमाड़ के सुदूर जंगलों के बीच बसे अपने गांव डुंगा पहुंची, तो माओवादियों ने उसे अपने साथ जोड़ लिया।

पहले उसे ‘डॉक्टर टीम’ में दवाइयां देना और इंजेक्शन लगाना सिखाया गया। बाद में बोटेर गांव के रिवोल्यूशनरी पॉलिटिकल स्कूल (रिपोस) में बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई। यहां वह करीब 50 बच्चों को माओवादी विचारधारा और संगठन का इतिहास पढ़ाती थी।

वर्ष 2016 में बीमारी के कारण वह मुख्यधारा में लौट आई। सरकार की पुनर्वास नीति के तहत कौशल विकास प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षण लेकर अब बस्तर पंडुम कैफे में काम कर रही है। उसके साथ पदमी, कमलू और सुकालु जैसे छह अन्य आत्मसमर्पित माओवादी भी यहां काम कर रहे हैं।

फगनी कहती है कि अब मैं कभी हथियार नहीं उठाना चाहती, न पुलिस के लिए और न माओवादियों के लिए। हिंसा छोड़ आत्मनिर्भरता की राहबस्तर में बदलाव की कई कहानियां हैं। कोंडागांव जिले के कोडलियार की रहने वाली मंगती माओवादी प्रभाव के कारण वर्ष 2015 में 16 साल की उम्र में संगठन में शामिल हो गई थी।

अगले 10 वर्षों तक वह कुतुल एरिया कमेटी में काम करती रही। वर्ष 2025 में अपने पति संतू उर्फ बदरू के साथ मुख्यधारा में लौट आई। पुनर्वास नीति के तहत सिलाई मशीन का प्रशिक्षण मिला। आज वह अपने घर में ही सिलाई की छोटी-सी दुकान चला रही है और हर महीने सात से आठ हजार रुपये की आय अर्जित कर रही है।

इसी तरह माओवादी संगठन के सबसे खतरनाक लड़ाकू दस्ते पीएलजीए बटालियन नंबर-एक का माओवादी मड़कम आयता पुनर्वास केंद्र में प्रशिक्षण मिलने के बाद आज सुकमा के पर्यटन स्थल तुंगल बांध में नाव संचालन का काम कर रहा है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मार्च 2026 तक माओवादी ¨हसा के खात्मे के लक्ष्य, सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और पुनर्वास नीति के कारण कई माओवादी अब रोजगार और सम्मान की तलाश में मुख्यधारा की ओर लौट रहे हैं।

सरकारी पुनर्वास नीति के तहत उन्हें आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ा जा रहा है।

बस्तर में बदलती तस्वीर

  • 2,700 माओवादी पिछले दो वर्षों में हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटे
  • 789 आत्मसमर्पित माओवादियों को इलेक्टि्रशियन, प्लंबर, टेलर और ड्राइविंग का प्रशिक्षण दिया गया
  • 589 आत्मसमर्पित माओवादी कौशल विकास केंद्रों में प्रशिक्षण ले रहे हैं

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