न्यूयॉर्क के भेदभाव-विरोधी कानूनों के तहत जाति को एक संरक्षित श्रेणी के रूप में शामिल करने के उद्देश्य से लाए गए दो विधेयक स्थानीय असेंबली में औंधे मुंह गिर गए हैं।
दोनों विधेयकों को इस विधायी सत्र में पारित नहीं कराया जा सका। न्यूयॉर्क सीनेट बिल एस.6531 और असेंबली बिल ए.6920 नामक ये विधेयक पहली बार 2025 में पेश किए गए थे।
इसके बाद इस बात पर बहस छिड़ गई कि ये विधेयक न्यूयॉर्क में रहने वाले हिंदुओं, भारतीयों या दक्षिण एशियाई मूल के लोगों को किस प्रकार अलग-थलग करेंगे और उनके बारे में रूढ़िवादिता फैलाएंगे।
जातिगत भेदभाव से जुड़े बिल खारिज
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ‘द कोलिशन ऑफ हिंदूज ऑफ नॉर्थ अमेरिका’ ने इन विधेयकों के पारित होने के खिलाफ अभियान चलाया। उन्होंने स्थानीय निवासियों से आग्रह किया कि वे अपने असेंबली मेंबर या सीनेटर से इन विधेयकों के खिलाफ मतदान करने को कहें।
गठबंधन ने कहा कि जाति एक तटस्थ शब्द नहीं है। जाति को संरक्षित श्रेणी बनाने के बजाय, असेंबली और सीनेट को न्यूयॉर्क के मानवाधिकार कानून में वंश-परंपरा को एक श्रेणी के रूप में शामिल करने पर विचार करना चाहिए। विधेयक पारित नहीं हो पाने पर हिंदू संगठन ने खुशी जताई है।
गठबंधन की निदेशक सुधा जगन्नाथन ने कहा- ‘शक्तिशाली मीडिया और राजनीतिक हस्तियों तक पहुंच रखने वाले अभिजात्य शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं के भारी दबाव के बावजूद यह नागरिक अधिकारों की जीत है।’
सुधा जगन्नाथन ने आगे कहा, ‘एक बहुजन हिंदू होने के नाते मैंने पिछले दो वर्षों में न्यूयॉर्क के कई जनप्रतिनिधियों से मुलाकात की है, ताकि मैं अपनी कहानी साझा कर सकूं और उन्हें जागरूक कर सकूं।’
सुधा जगन्नाथन ने बताया, ‘मुझे यह बेहद आपत्तिजनक लगता है कि न्यूयॉर्क मेरी पहचान को मेरी ही संस्कृति और परंपराओं के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है।’
संगठन ने 2024 में कराए गए एक अध्ययन का हवाला दिया और कहा कि अध्ययन में पाया गया कि संस्थागत शक्ति वाले लोगों द्वारा जाति पर अनौपचारिक संदर्भ और बातचीत के भी गंभीर परिणाम हुए हैं। इससे किसी व्यक्ति द्वारा हिंदुओं और भारतीय-अमेरिकियों के खिलाफ हिटलर जैसे बयानों से सहमत होने की आशंका बढ़ जाती है।