दुनिया एक ऐसे मोड़ पर है जहां बच्चों की मानसिक सुरक्षा और टेक कंपनियों के मुनाफे के बीच सीधा टकराव दिख रहा है।
सरकारें 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया की लत और उसके दुष्प्रभावों से बचाने के लिए कड़े कानून बना रही हैं, जबकि गूगल और मेटा जैसे प्लेटफार्म इनके पालन में ढिलाई बरतते नजर आ रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया ऐसा कानून लागू करने वाला पहला देश बना, लेकिन वहां भी बच्चे आसानी से आयु सत्यापन प्रणाली को चकमा दे रहे हैं।
संचार मंत्री अनिका वेल्स ने चेतावनी दी है कि कंपनियों को कानून मानना ही होगा। इंडोनेशिया ने हाल ही में स्पष्ट किया कि कंपनियों को यूजर्स की उम्र का सख्ती से सत्यापन करना होगा और 16 साल से कम उम्र के अकाउंट हटाने होंगे।
इसके बावजूद यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर नियमों के पूर्ण पालन न करने के आरोप हैं, जिससे टकराव तेज हो गया है।गूगल ने कहा, निर्णय माता-पिता को लेना चाहिएदबाव के बीच मेटा और गूगल का तर्क है कि बच्चों के लिए क्या सही है, यह निर्णय माता-पिता को लेना चाहिए।
उनका कहना है कि पूर्ण प्रतिबंध बच्चों को असुरक्षित प्लेटफार्म की ओर धकेल सकता है और पैरेंटल कंट्रोल जैसे फीचर भी खत्म हो सकते हैं। यह बहस अब वैश्विक हो चुकी है।
मलेशिया, स्पेन विचार कर रहे हैं, जबकि अमेरिका में भी इंटरनेट मीडिया के कुछ फीचर्स को बच्चों के लिए हानिकारक माना गया है। इंडोनेशिया में एक्स और बिगो लाइव ने नियम माने हैं, टिकटाक और रोब्लाक्स आंशिक पालन कर रहे हैं, जबकि गूगल और मेटा पर सबसे ज्यादा दबाव है।