नमाज पढ़ने की अनुमति मांगी, फिर को-पायलट ने किया जानलेवा हमला; कैप्टन मच्छर ने बयां की 30 सितंबर की खौफनाक घटना की पूरी कहानी…

दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान में सब कुछ सामान्य था। तभी ओमानी को-पायलट ने नमाज पढ़ने के लिए दूसरे कैप्टन से कॉकपिट से बाहर जाने को कहा।

कुछ ही देर बाद भारतीय पायलट स्मित मच्छर पर पीछे से जानलेवा हमला हुआ। 38 वर्षीय कैप्टन मच्छर को पहले लगा कि विमान की छत से कोई हिस्सा टूटकर उनके सिर पर गिरा है, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि उन पर हमला किया जा रहा है।

शनिवार को ‘स्काई न्यूज अरबिया’ को दिए साक्षात्कार में कैप्टन मच्छर ने बताया कि उड़ान के करीब दो घंटे बाद वापसी की उड़ान संभालने वाले एक अन्य कैप्टन कॉकपिट में आए थे।

इसी दौरान ओमानी को-पायलट शौचालय से लौटा और कुछ देर बातचीत के बाद नमाज पढ़ने की इच्छा जताई। कैप्टन मच्छर के मुताबिक, उन्हें यह असामान्य नहीं लगा, क्योंकि पायलट आराम के समय नियंत्रण दूसरे को सौंपकर प्रार्थना कर सकते हैं। यह पहली बार था, जब वह उस को-पायलट के साथ उड़ान भर रहे थे।

बार-बार खो रहे थे होश

मच्छर ने बताया कि वह अपनी सीट पर बैठकर स्क्रीन पर लैंडिंग के समय और ईंधन की मात्रा की जांच कर रहे थे, जबकि को-पायलट उनके पीछे खड़ा था।

अचानक उनके सिर के पिछले हिस्से पर जोरदार प्रहार हुआ। उन्हें लगा विमान की छत से कोई चीज गिरी है। हालांकि, जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि उन पर हमला हुआ है। उन्होंने सीट बेल्ट खोली और बचाव की कोशिश की, लेकिन इस दौरान उनके हाथ में भी चोट लग गई।

उन्होंने दूसरे कैप्टन को वापस बुलाने और कॉकपिट का दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह बेहोश हो गए। मच्छर के मुताबिक, उन्हें याद है कि दरवाजा खुला था, लेकिन हमलावर ने बाकी लोगों को भी मारने की धमकी दी। इसके बाद दरवाजा फिर बंद हो गया।

कुछ ही देर में होश में आने पर उन्होंने इंजनों की आवाज धीमी होते सुनी और विमान को नीचे की ओर जाते महसूस किया। बार-बार होश खोने के बीच उन्होंने दोबारा दरवाजे तक पहुंचने की कोशिश की। उन्हें धुंधला-सा याद आया कि दरवाजा खुला था और वह कॉकपिट तथा गैली के बीच पड़े थे।

सबसे पहले बेटे को किया याद

अस्पताल में दिए साक्षात्कार के दौरान मच्छर ने बताया कि हमले के समय उन्हें लगा था कि शायद वह बच नहीं पाएंगे। लेकिन उन्होंने खुद से कहा, “तुम इस तरह नहीं मर सकते।” उनके मुताबिक, जीवित रहने की इसी जिद ने उन्हें संघर्ष करने की ताकत दी।

अपने इलाज और मदद करने वालों को याद करते हुए उनकी आंखें नम हो गईं। जब उनसे पूछा गया कि घटना के बाद सबसे पहले किसे याद किया, तो उन्होंने भावुक होकर बताया कि उन्होंने अपने दो साल के बेटे को पुकारा था।

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