अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की दूसरी पारी में लागू की गई विवादित टैरिफ नीति को सुप्रीम कोर्ट से झटका मिलने के बाद अमेरिका आयातकों से वसूले गए अरबों डॉलर लौटा रहा है।
लांकि विशेषज्ञों का मानना है कि टैरिफ से वसूली गई राशि वापस करने भर से वैश्विक व्यापार व्यवस्था और अमेरिकी आर्थिक विश्वसनीयता को हुए नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।
ट्रंप के टैरिफ वापस करने के बाद भी डर
ट्रंप प्रशासन ने अप्रैल 2025 में इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनोमिक पावर्स एक्ट (आइईईपीए) के तहत कई देशों पर व्यापक टैरिफ लगाए थे।
भारत पर भी 25 प्रतिशत सामान्य टैरिफ के साथ रूस से तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क लगाया गया था। लेकिन 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से इस फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि कर और सीमा शुल्क लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है।
कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिका करीब 166 अरब डॉलर आयातकों को छह प्रतिशत ब्याज के साथ लौटा रहा है। इनमें से लगभग 85 अरब डॉलर का भुगतान किया जा चुका है।
हालांकि ट्रंप प्रशासन ने दूसरी कानूनी व्यवस्थाओं के जरिए सीमित अवधि के लिए नए टैरिफ लगाने की रणनीति भी अपनाई है। हाल में अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा, कथित अनुचित व्यापार नीतियों और बंधुआ मजदूरी से जुड़े आरोपों के आधार पर कई देशों के निर्यात पर नए टैरिफ लागू किए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार टैरिफ से सबसे अधिक नुकसान छोटे और मध्यम कारोबारों को हुआ। एक विश्लेषण के मुताबिक, छोटे कारोबारों को औसतन 3.06 लाख डॉलर अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा।
कई कंपनियों का पैसा महीनों तक फंसा रहा, ऑर्डर रद हुए, आपूर्ति शृंखला बाधित हुई और निवेश संबंधी फैसले टालने पड़े। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ अटलांटा का अनुमान है कि वित्तीय दबाव झेल रहे कारोबारों को कुल रिफंड का लगभग 56 अरब डॉलर मिलेगा, जिससे उन्हें कुछ राहत मिल सकती है।
हालांकि आर्थिक नुकसान से ज्यादा चिंता वैश्विक व्यापार में बढ़ी अनिश्चितता को लेकर है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई भी अमेरिकी प्रशासन अचानक टैरिफ लगाकर उन्हें राजनीतिक दबाव के औजार की तरह इस्तेमाल कर सकता है, तो अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और देशों का भरोसा कमजोर होता है।
इससे देश वैकल्पिक व्यापारिक साझेदार और नए क्षेत्रीय व्यापार समूह तलाशने लगते हैं।विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भले ही ट्रंप की पहली टैरिफ नीति पर रोक लगा दी हो, लेकिन इससे न तो कारोबारियों का खोया भरोसा लौटेगा और न ही वैश्विक व्यापार व्यवस्था में आई अनिश्चितता तुरंत खत्म होगी।
टैरिफ की रकम वापस की जा सकती है, लेकिन व्यापारिक विश्वास और स्थिरता की बहाली कहीं अधिक लंबी और कठिन प्रक्रिया होगी।