कर्नाटक हाई कोर्ट ने कृषि भूमि पर दावा करने वालों से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने समान उपनाम और नाम का फायदा उठाकर पुश्तैनी कृषि भूमि पर दावा करने की कोशिश को खारिज कर दिया है।
अदालत ने कहा कि केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज हो जाने से स्वामित्व सिद्ध नहीं होता, खासकर तब जब कथित खरीद-बिक्री का कोई वैध दस्तावेज मौजूद न हो।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने चित्तदुर्ग जिले के जी.बी. हट्टी गांव के तीन भाइयों जी. थिप्पेस्वामी, जी. विरुपाक्षप्पा और जी. राजशेखरप्पा को विवादित जमीन का वैध संयुक्त मालिक घोषित करते हुए बसप्पा और उसके परिवार को जमीन के कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोक दिया।
1946 में बिक्री का दावा, लेकिन कोई दस्तावेज नहीं
कर्नाटक हाई कोर्ट के सामने आया मामला पुश्तैनी कृषि भूमि से जुड़ा था। बसप्पा ने दावा किया था कि वर्ष 1946 में भाइयों के पूर्वज डोड्डामल्लप्पा और सन्नामल्लप्पा ने यह जमीन उसके पूर्वज गौडर सन्नाबसप्पा को बेच दी थी।
बसप्पा ने यह भी कहा कि बाद में उसके पिता राजशेखरप्पा के नाम राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टियां दर्ज हुईं और 1997 में उसके नाम म्यूटेशन कर दिया गया।
हालांकि, अदालत में बसप्पा बिक्री से जुड़ा कोई बिक्री विलेख (सेल डीड) पेश नहीं कर सका। यही नहीं, राजस्व रिकॉर्ड में भी उसके पूर्वजों के नाम का कोई स्पष्ट आधार नहीं मिला।
समान नाम का उठाया फायदा
तीनों भाइयों ने अदालत को बताया कि उनके परिवार की जमीन कभी बेची नहीं गई थी। उन्होंने 1930 की एक पंजीकृत बंधक (मॉर्गेज) डीड, पुनर्सर्वे रिकॉर्ड और अन्य राजस्व दस्तावेज पेश किए।
तीनों भाइयों का कहना था कि ‘राजशेखरप्पा’ नाम की प्रविष्टि वास्तव में परिवार के सदस्य जी. राजशेखरप्पा की थी, जबकि बसप्पा ने समान नाम का फायदा उठाकर 1997 में अवैध तरीके से अपने पक्ष में म्यूटेशन करा लिया।
यह विवाद 1997 में शुरू हुआ था। निचली अदालत ने 2005 में भाइयों की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया। 14 मई 2026 को हाई कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए कहा कि बसप्पा जमीन पर अपना स्वामित्व साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।
अदालत ने कहा, ‘एक बार बंधक हमेशा बंधक ही रहता है। बंधकधारी संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता। प्रतिवादी कोई बिक्री विलेख प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे साबित हो कि उसके पूर्वजों ने संपत्ति खरीदी थी।’
अदालत ने 1995 की मतदाता सूची का भी परीक्षण किया। इसमें जी.बी. हट्टी गांव के निवासी के रूप में जी. टी. राजशेखरैया का नाम दर्ज था, जिसे अदालत ने वादी परिवार से जुड़ा माना। दूसरी ओर, बसप्पा रायपुर गांव का निवासी निकला और वह यह साबित नहीं कर सका कि उसके पिता कभी जी.बी. हट्टी में रहते थे।
हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि वादी परिवार और डोड्डामल्लप्पा-सन्नामल्लप्पा के अन्य कानूनी वारिस विवादित जमीन के संयुक्त मालिक हैं। बसप्पा और उसके परिवार को जमीन के कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोका जाता है।