यदि किसी देश की बिजली, अस्पताल या पूरा डेटा सिस्टम महज एक बटन दबाते ही ठप हो जाए, तो क्या होगा? तकनीक की दुनिया में इस खौफनाक व्यवस्था को किल स्विच कहा जाता है।
दरअसल, वर्तमान में यूरोपीय देशों की पूरी तकनीक काफी हद तक अमेरिका और चीन पर निर्भर है।
ऐसे में यूरोपीय देशों को अब यह डर सताने लगा है कि किसी बड़े संकट या युद्ध के वक्त ये विदेशी टेक कंपनियां उनके डिजिटल सिस्टम को पूरी तरह पंगु (ठप) बना सकती हैं।
यूरोप को अमेरिकी-चीनी टेक से क्या खतरा है?
यूरोपीय संघ (EU) का मानना है कि अमेरिका और चीन की टेक कंपनियों पर उनकी अत्यधिक निर्भरता अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी है। खासकर क्लाउड, एआई (AI) और माइक्रोचिप्स जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर्स में यूरोप पूरी तरह दूसरों के भरोसे है।
‘किल स्विच’ से यूरोप को क्या है डर?
यूरोपीय अधिकारियों के अनुसार, विदेशी क्लाउड कंपनियों के पास ऐसा तकनीकी नियंत्रण मौजूद है, जिससे वे आपात स्थिति या युद्ध जैसे तनाव के हालातों में यूरोप के भीतर अपनी सेवाएं अचानक बंद कर सकती हैं। इससे पूरा यूरोप एक झटके में डिजिटल ब्लैकआउट का शिकार हो सकता है।
अमेरिकी टेक कंपनियों पर सख्ती क्यों?
यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष हेन्ना विर्कुनेन के मुताबिक, अमेरिका का ‘क्लाउड एक्ट’ अमेरिकी सरकार को यह विशेष अधिकार देता है कि वह अपनी कंपनियों से किसी भी देश का डेटा मांग सकती है- चाहे वह डेटा यूरोप के भीतर ही क्यों न रखा गया हो। अमेरिकी कानून की यही बात यूरोप को सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कराती है।
आत्मनिर्भर बनने के लिए यूरोपीय संघ का क्या है प्लान
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने साफ शब्दों में कहा है, “हम उन तकनीकों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकते जो हमारे अस्पताल, ऊर्जा ग्रिड और सार्वजनिक सेवाएं चलाती हैं।”