पश्चिम एशिया में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के बीच सऊदी अरब अब अमेरिका की रणनीति को लेकर चिंतित नजर आ रहा है।
रिपोर्टों के मुताबिक, रियाद ने अमेरिकी प्रशासन पर दबाव डाला है कि वह ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी की योजना को छोड़कर फिर से बातचीत की राह अपनाए।
वाल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब को डर है कि अगर अमेरिका ने ईरान पर दबाव और बढ़ाया, तो तेहरान जवाबी कार्रवाई करते हुए अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को भी बाधित कर सकता है।
खासतौर पर लाल सागर का बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य- जो सऊदी के बचे हुए तेल निर्यात के लिए बेहद अहम है- सबसे बड़ा जोखिम बनकर उभर रहा है। करीब छह सप्ताह से जारी संघर्ष ने खाड़ी क्षेत्र के दशकों पुराने ऊर्जा संतुलन को हिला दिया है।
हालांकि सऊदी अरब ने होर्मुज में बाधा के बावजूद रेगिस्तान के पार पाइपलाइन के जरिए अपने कच्चे तेल को लाल सागर तक पहुंचाकर निर्यात को फिर से लगभग 70 लाख बैरल प्रतिदिन तक बहाल कर लिया है, लेकिन अब उसे इस वैकल्पिक मार्ग की सुरक्षा की चिंता सताने लगी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बाब-अल-मंदेब के आसपास का तटीय इलाका यमन में ईरान समर्थित हाउती विद्रोहियों के प्रभाव में है। गाजा युद्ध के दौरान हाउतियों ने इस मार्ग को पहले भी बाधित किया था और अब आशंका है कि ईरान के इशारे पर वे फिर ऐसा कर सकते हैं।
इस बीच, ईरान की तस्नीम समाचार एजेंसी और शीर्ष नेतृत्व के करीबी सूत्रों ने भी संकेत दिया है कि अगर अमेरिकी नाकेबंदी जारी रही, तो लाल सागर मार्ग पर असर पड़ सकता है।
ईरान के वरिष्ठ सलाहकार अली अकबर वेलायती ने भी चेतावनी दी है कि तेहरान बाब-अल-मंदेब को उसी नजर से देखता है, जैसे होर्मुज को। जरूरत पड़ने पर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को एक इशारे पर बाधित किया जा सकता है।यदि बाब अल मंदेब बंद हुआ तो पांच प्रतिशत तेल आपूर्ति और प्रभावित होगी।
होर्मुज में ईरान और अमेरिकी की नाकेबंदी के चलते 20 प्रतिशत आपूर्ति पहले से ही प्रभावित है। नाकेबंदी से पहले कुल 40 जहाज होर्मुज से निकल सके हैं, जबकि सामान्य परिस्थितियों में 140 जहाज प्रतिदिन होर्मुज को पार करते थे।