अमेरिका को छोटे देश का झटका, 50% चिप की मांग को किया खारिज…

वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में अमेरिका की दबंगई को छोटे से द्वीप देश ताइवान ने करारा जवाब दिया है। ताइवान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका के उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा, जिसमें कहा गया था कि ताइवान अपने 50 प्रतिशत सेमीकंडक्टर उत्पादन को अमेरिकी भूमि पर शिफ्ट करे।

ताइवान की उप-प्रधानमंत्री चेंग ली-च्युन ने बुधवार को यह बयान दिया। चेंग ली-च्युन ताइवान की मुख्य टैरिफ वार्ताकार भी हैं।

चेंग ने स्पष्ट किया कि “50-50 चिप उत्पादन विभाजन” का विचार केवल अमेरिका का है और ताइवान ने इस दिशा में कभी कोई प्रतिबद्धता नहीं दी है। उन्होंने कहा, “मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि यह अमेरिका की सोच है। हमारी वार्ता टीम ने कभी इस तरह की कोई सहमति नहीं दी। कृपया निश्चिंत रहें, हमने इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की और न ही ऐसी किसी शर्त को मानेंगे।”

अमेरिका-ताइवान व्यापार तनाव

चेंग हाल ही में वॉशिंगटन से लौटी हैं, जहां उन्होंने अमेरिकी टैरिफ को लेकर वार्ताएं कीं। उन्होंने बताया कि बातचीत में “कुछ प्रगति” हुई है, लेकिन अभी अंतिम समझौता नहीं हो सका है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने ताइवान से आने वाले सेमीकंडक्टर्स पर अस्थायी रूप से 20 प्रतिशत टैरिफ लगाया है।

इस कदम से ताइवान के उद्योग जगत में चिंता बढ़ गई है। ट्रंप ने यह भी चेतावनी दी है कि वह सेमीकंडक्टर्स पर “काफी बड़ा टैरिफ” लगाने पर विचार कर रहे हैं।

एआई की मांग और ताइवान पर दबाव

हाल के महीनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक की मांग में भारी उछाल आया है। इसके चलते ताइवान और अमेरिका के बीच व्यापार घाटा और भी बढ़ गया है।

अमेरिकी आंकड़ों के अनुसार, ताइवान से अमेरिका को होने वाले 70 प्रतिशत से अधिक निर्यात सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) क्षेत्र से जुड़े हैं, जिनमें चिप्स भी शामिल हैं।

इसी दबाव को कम करने के लिए ताइवान ने अमेरिका में अधिक निवेश करने, अमेरिकी ऊर्जा की अधिक खरीद करने और अपने रक्षा खर्च को जीडीपी के तीन प्रतिशत से अधिक बढ़ाने का वादा किया है।

ताइवान का ‘सिलिकॉन शील्ड’

ताइवान वर्तमान में दुनिया के 50 प्रतिशत से अधिक सेमीकंडक्टर बनाता है, जिनमें से उच्चतम तकनीक वाले चिप्स का लगभग पूरा उत्पादन वही करता है।

इसे लंबे समय से ताइवान की “सिलिकॉन शील्ड” माना जाता है। यह एक ऐसी सामरिक ढाल है जो चीन द्वारा आक्रमण या नाकाबंदी की स्थिति में अमेरिका को ताइवान की सुरक्षा में शामिल होने के लिए मजबूर करती है।

अमेरिकी पक्ष क्या कहता है?

अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लटनिक ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि ताइवान का 50 प्रतिशत चिप उत्पादन अमेरिका में होना चाहिए। उनका तर्क था कि “अगर हमें कभी जरूरत पड़े तो हमारे पास खुद उत्पादन करने की क्षमता होनी चाहिए।

हमारा लक्ष्य अमेरिकी खपत के लिए कम से कम 40 से 50 प्रतिशत चिप्स और वेफर्स का उत्पादन करना है।” उन्होंने चेतावनी भी दी कि यदि ताइवान इस ’50-50′ योजना पर सहमत नहीं होता, तो चीन के संभावित आक्रमण के खिलाफ अमेरिकी सुरक्षा सहायता पर असर पड़ सकता है।

गौरतलब है कि ताइवान दुनिया की सबसे एडवांस सेमीकंडक्टर चिप्स का 90 प्रतिशत से अधिक उत्पादन करता है। वह अमेरिका की इस मांग को अपनी आर्थिक संप्रभुता पर हमला मानता है।

ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (टीएसएमसी) दुनिया की सबसे बड़ी चिप निर्माता कंपनी है, जो एनवीडिया, एप्पल जैसी अमेरिकी टेक दिग्गजों के लिए चिप्स बनाती है।

ताइवान के अधिकारियों का कहना है कि सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन इतनी जटिल और विशेषज्ञता वाली है कि इसे किसी एक देश में पूरी तरह स्थानांतरित करना असंभव है।

उप-प्रधानमंत्री चेंग ली-चुन ने जोर देकर कहा कि ताइवान अमेरिका के साथ सहयोग जारी रखेगा, लेकिन अपनी उत्पादन क्षमता को जबरन स्थानांतरित नहीं करेगा।

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की यह मांग लंबे समय से चली आ रही चिंताओं का नतीजा है। ताइवान की चीन से निकटता के कारण अमेरिका को लगता है कि चिप सप्लाई पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है।

वर्तमान में, अमेरिका अपनी चिप जरूरतों का मात्र 2 प्रतिशत ही घरेलू उत्पादन से पूरा करता है। लुटनिक का लक्ष्य ट्रंप के कार्यकाल के अंत तक इसे 40 प्रतिशत तक ले जाना है, जिसके लिए 500 अरब डॉलर से अधिक निवेश की जरूरत होगी।

ट्रंप ने मार्च 2025 में टीएसएमसी के साथ 100 अरब डॉलर के निवेश का सौदा किया था, जिसमें अमेरिका में चिप प्लांट्स और पैकेजिंग सुविधाओं का विस्तार शामिल है। टीएसएमसी ने पहले ही 65 अरब डॉलर का निवेश करने का वादा किया था।

लेकिन अमेरिका 20 प्रतिशत टैरिफ लगाकर ताइवान के निर्यात पर दबाव बना रहा है, जबकि ताइवान अमेरिका के साथ बड़े व्यापार अधिशेष का सामना कर रहा है।

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