बिहार में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआइआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान नामों को जोड़ना या हटाना मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया का हिस्सा है। कोर्ट ने आधार कार्ड की स्वीकार्यता पर भी बड़ा रुख अपनाया।
पीठ ने कहा कि केवल धोखाधड़ी की संभावना के आधार पर 12 अंकों वाले इस बायोमेट्रिक पहचान पत्र को खारिज नहीं किया जा सकता।
जजों ने तर्क दिया कि यदि कोई दस्तावेज कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है, तो उसे केवल इसलिए नहीं नकारा जा सकता क्योंकि उसके जारी होने में किसी निजी इकाई की भूमिका है।
मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के आरोप लगाए।
उन्होंने तर्क दिया कि नागरिकता तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, चुनाव आयोग के पास नहीं। वहीं, चुनाव आयोग ने अपने बचाव में कहा कि आधार या मतदाता पहचान पत्र नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकते।
आयोग के अनुसार, आधार का उपयोग केवल नामों के दोहराव को रोकने के लिए किया जा सकता है। इस मामले में अंतिम सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहने की संभावना है।
जस्टिस स्वामीनाथन पर टिप्पणी मामले में तमिलनाडु को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन के खिलाफ जाति और धर्म आधारित अपमानजनक टिप्पणी करने वाले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है।
जस्टिस स्वामीनाथन ने पिछले महीने मदुरै में तिरुप्पारनकुंद्रम पहाड़ी पर दरगाह के पास स्थित दीपथून स्तंभ पर दीपक प्रज्ज्वलित करने की अनुमति दी थी। इसी आदेश के बाद उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां की गई थीं।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वरले की पीठ ने राज्य सरकार, पुलिस महानिदेशक, चेन्नई के पुलिस आयुक्त और अन्य को नोटिस जारी किए। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को इस मामले में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की सुनवाई दो फरवरी को होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने वकील जीएस मणि की तरफ से दाखिल याचिका पर सुनवाई की।
इसमें यह आरोप लगाया गया है कि वाम दलों समेत सत्तारूढ़ द्रमुक समर्थित पार्टियों के साथ ही कुछ लोगों और वकीलों ने न केवल सार्वजनिक स्थानों बल्कि चेन्नई और मदुरै में मद्रास हाई कोर्ट के परिसरों में अवैध प्रदर्शन किए, जिसमें जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। याचिका में तमिलनाडु सरकार और पुलिस अधिकारियों को ऐसे कृत्यों के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का निर्देश देने की मांग की गई है।