बढ़ते तापमान के दौर में असामान्य ठंड, ग्लोबल वार्मिंग पर वैज्ञानिकों के बीच तेज़ बहस…

दुनिया भर में बढ़ते तापमान के बीच कई क्षेत्रों में पड़ रही असामान्य ठंड ने विज्ञानियों के बीच नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ धरती के गर्म होने से जलवायु परिवर्तन की चिंताएं जताई जा रही हैं, वहीं जबरदस्त ठंड के दौर से इस थियरी पर प्रश्नचिह्न भी उठने लगे हैं।

न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, विज्ञानियों ने अपने-अपने विचार के जरिये इसका समाधान बताया है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (एमआइटी) के शोध विज्ञानी जूडा कोहेन का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र के तेजी से गर्म होने से ऊपरी वायुमंडल में मौजूद ‘पोलर वर्टेक्स’ अस्थिर हो रहा है।

यह अस्थिरता जेट स्ट्रीम के प्रवाह को प्रभावित करती है, जिससे अमेरिका के पूर्वी हिस्सों में लंबे समय तक ठंडी हवाएं और बर्फीले तूफान देखे जा रहे हैं।

सर्दियों की तीव्रता पर असर

कोहेन के अनुसार, हाल के वर्षों में पोलर वर्टेक्स के फैलने और डगमगाने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिसका असर सर्दियों की तीव्रता पर पड़ रहा है। हालांकि, कई अन्य विज्ञानी इस सिद्धांत से सहमत नहीं हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के चलते कम हो रही ठंड

कनाडा के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के शोधकर्ता रसेल ब्लैकपोर्ट का कहना है कि दीर्घकालिक आंकड़े और जलवायु माडल बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते अत्यधिक ठंड की घटनाएं कम हो रही हैं।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि किसी एक मौसमी घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना जल्दबाजी हो सकती है। फिर भी, यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन मौसमी पैटर्न को प्रभावित कर रहा है और भविष्य में मौसम की चरम स्थितियां अलग-अलग रूपों में देखने को मिल सकती हैं।

वुडवेल क्लाइमेट सेंटर के वरिष्ठ विज्ञानी जेनिफर फ्रांसिस ने कहा कि पूर्वी क्षेत्र में अत्यधिक ठंड को जलवायु परिवर्तन से जोड़ना जल्दबाजी हो सकती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि लंबे समय तक चलनेवाली गर्मी से मौसमी बदलावों का पैटर्न बदल रहा है।

जलवायु परिवर्तन का अंदाजा लगाना जल्दबाजी

कोलोराडो की एक रिसर्च विज्ञानी एमी बटलर ने कहा कि ठंड के एक दौर से जलवायु परिवर्तन का अंदाजा लगाना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि लंबे समय तक बनी रहनेवाली अत्यधिक ठंड की अवधि दिनों दिन घटती जा रहा है और ये लगातार कम होती जाएगी। 

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