हिमाचल प्रदेश में शाहपुर की बोह घाटी में मंगलवार सुबह बादल फटने और भूस्खलन से आई विनाशकारी आपदा ने सिर्फ घर और पशुशालाएं ही नहीं उजाड़ीं, बल्कि क्षेत्र की एक ऐतिहासिक धरोहर भी हमेशा के लिए खत्म कर दी। गडघूं गांव में करीब 150 वर्ष पुराना ओंकार सिंह और करतार चंद परिवार का पुश्तैनी तीन मंजिला हेरिटेज होम देखते ही देखते मलबे में समा गया।
महज दस मिनट में प्रकृति के कहर ने उस विरासत को मिटा दिया, जिसने चार पीढ़ियों के इतिहास और पहाड़ी संस्कृति को अपने भीतर संजो रखा था।
पहाड़ी वास्तुकला अनूठा नमूना था भवन
यह मकान पारंपरिक कांगड़ी-पहाड़ी वास्तुकला का अनूठा नमूना था। हालांकि परिवार अब कोटला के सोलधा क्षेत्र में बस चुका था, लेकिन उन्होंने अपने पूर्वजों की इस निशानी को न तो गिराया और न ही आधुनिक स्वरूप दिया। इसे मूल स्वरूप में सुरक्षित रखा गया था, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत को देख सकें।
पर्यटक जरूर पहुंचते थे निहारने
अब उस ऐतिहासिक हेरिटेज होम की जगह सिर्फ मलबे का ढेर बचा है। इसके साथ ही बोह घाटी की एक ऐसी सांस्कृतिक धरोहर भी हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में सिमट गई, जिसे देखकर पर्यटक पहाड़ की पारंपरिक वास्तुकला और जीवनशैली का एहसास किया करते थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस विरासत का खत्म होना केवल एक परिवार का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को लगी गहरी चोट है।
हेरिटेज होम के सामने फोटो के बिना सफर रहता था अधूरा
करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित प्रसिद्ध खबरू वाटरफॉल घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए यह मकान विशेष आकर्षण का केंद्र था। पहाड़ी शैली में बने इस हेरिटेज होम के साथ अधिकांश पर्यटक तस्वीरें और सेल्फी लेना नहीं भूलते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस घर के सामने फोटो लिए बिना कई पर्यटकों को अपनी यात्रा अधूरी लगती थी। तीन मंजिला इस भवन की बनावट भी अपने आप में अनोखी थी। भूतल पर पशुओं के लिए स्थान बनाया गया था। पहली मंजिल पर परिवार के रहने के कमरे थे, जबकि सामने बना बरामदा तीन पीढ़ियों के सुख-दुख का साक्षी रहा। सबसे ऊपरी मंजिल पर रसोई और खुला स्थान था, जहां पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों की खुशबू हमेशा महकती रहती थी। यह मकान केवल ईंट, पत्थर और लकड़ी का ढांचा नहीं, बल्कि क्षेत्र की लोक संस्कृति, पारिवारिक परंपराओं और पहाड़ी जीवनशैली की जीवंत पहचान था।