फारस की खाड़ी के अरब देश तेल ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव के बाद भी अपने कच्चे तेल का निर्यात युद्ध-पूर्व स्तर पर लाने में सफल रहे हैं। हालांकि अमेरिका की ओर से लगाई गई सख्त समुद्री नाकेबंदी के कारण ईरान का अपना तेल निर्यात लगभग शून्य बना हुआ है।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही रोककर अमेरिका पर कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति बनाई थी।
होर्मुज में क्या बदलाव हुआ
टैंकर ट्रैकिंग संस्था केप्लर के हालिया आंकड़ों के अनुसार 1 से 28 सितंबर के बीच रोजाना करीब 1.65 करोड़ बैरल कच्चे तेल और कडेनसेट का निर्यात हुआ, जो यु्द्ध से पहले के औसत के बराबर है। कुल निर्यात का 60 प्रतिशत होमुर्ज के रास्ते गुजरा।
लगभग 40 प्रतिशत तेल अब होर्मुज के बजाय जमीनी पाइपलाइनों और अन्य बंदरगाहों से भेजा जा रहा है। युद्ध से पहले यह आंकड़ा महज 17 प्रतिशत था। जुलाई से लागू नाकाबंदी के चलते होर्मुज के रास्ते ईरानी तेल का निर्यात पूरी तरह से ठप हो चुका है।
अरब देशों में क्या रास्ता निकाला?
सऊदी अरब ने लाल सागर तक जाने वाली पाइपलाइनों और संयुक्त अरब अमीरात ने फुजैरा बंदरगाह तक जाने वाली पाइपलाइनों का इस्तेमाल बढ़ा दिया है।
खाड़ी देशों ने 63 बहुत बड़े तेल टैंकरों का एक नेटवर्क तैयार किया है। ये टैंकर होर्मुज के भीतर से तेल लाकर फुजैरा के पास बाहरी बड़े जाहजों में तेल ट्रांसफर करते हैं।
अमेरिकी वायु और नौसैनिक बल जहाजों को हवाई सुरक्षा देने के साथ-साथ संभावित ड्रोन, मिसाइल और बॉट हमलों से सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं।
बढ़ती लागत बनी चुनौती
तेल का निर्यात शुरू होने के बाद भी खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, अमेरिकी नौसेना के सुझाए गए दक्षिणी मार्ग से इतर जाने वाले जहाजों पर अब भी हमले दर्ज किए जा रहे हैं।
इराक जैसे देशों को अपना तेल बेचने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार दरों से 34.5 डॉलर से 37 डॉलर प्रति बैरल तक की भारी छूट देनी पड़ रही है।
जहाजों के बीमा, शटल ट्रांसफर और अमेरिकी सैन्य तैनाती का खर्च काफी बढ़ गया है, जिसे लंबे समय तक सहन करना चुनौतीपूर्ण होगा।
तेल की कीमतें अभी भी ज्यादा क्यों?
कच्चे तेल का निर्यात सामान्य स्तर पर लौटने के बाद भी बाजार में कीमतें नीचे नहीं आ रही हैं। क्योंकि बाजार का संघर्ष दोबारा बढ़ने और होर्मुज में फिर रुकावट आने का अंदेशा है।
युद्ध की शुरुआत से अब तक वैश्विक तेल भंडार से 50 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल निकाला जा चुका है जिस कारण तेल का भंडार लगातार घटता जा रहा है। डीजल, जेट फ्यूल और गैस का निर्यात अब भी सामान्य से 81 प्रतिशत तक कम है। टैंकरों के बढ़े भाड़े और सुरक्षा उपायों की वजह से लागत बढ़ी हुई है।
कब तक सामान्य होगी स्थिति
विशेषज्ञों की मानें तो अमेरिका और अरब देश फिलहाल ईरान के दबाव को बेअसर करने में सफल रहे हैं। हालांकि रिफाइंड पेट्रोकेमिकल्स की कमी, आयात पर असर और सैन्य सुरक्षा की भारी लागत यह दर्शाती है कि स्थिति पूरी तरह से नॉर्मल होने में अभी समय लगेगा।